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Monday, August 26, 2019

श्री राधारमण हरि बोल

राधारमण मंदिर स्थित प्रतिमा के अवतरण की कथा

वृन्दावन के इस प्राचीन विग्रह के स्वयं प्राकटय होने के बारे में गोस्वामी ने बताया कि दक्षिण में कावेरी के तट पर श्रीरंगम का विशाल मंदिर है। मंदिर के महंत महान विद्वान अर्चक वेंकट भट्ट थे। चैतन्य महाप्रभु ने अपनी दक्षिण यात्रा के समय वेंकट भट्ट के यहां ही जब चातुर्मास किया था तो वेंकट भट्ट के पुत्र गोपाल भट्ट ने उनके इस प्रकल्प में बहुत अधिक सहयोग किया था।

चार माह बीतने के बाद जब चैतन्य महाप्रभु चलने लगे तो गोपाल भट्ट भी उनके साथ जाने को तैयार हो गए। इस पर चैतन्य महाप्रभु ने वेंकट भट्ट को आज्ञा दी कि वे गोपाल भट्ट की शिक्षा दीक्षा पूरी कराकर उन्हें वृन्दावन भेज दें। उन्होंने उनसे यह भी कहा था कि गोपाल भट्ट को वे एक बार नेपाल में गंडकी नदी में स्नान के लिए अवश्य भेजें क्योंकि वहां पर इन्हें प्रभु का अभूतपूर्व आशीर्वाद मिलेगा।

नेपाल की गंडकी नदी से मिले थे 12 शालिग्राम

आचार्य दिनेश चन्द्र गोस्वामी ने बताया कि अपनी शिक्षा दीक्षा पूरी करके अपने माता पिता की आज्ञा लेकर गोपाल भट्ट तीर्थाटन के लिए चल पड़े। भक्ति सिंद्धांत का प्रचार करते करते वह नेपाल पहुंचे। वहां पर गण्डकी नदी में स्नान करने के दौरान एक ऎसी घटना घटी जो प्रत्येक भगवत भक्त को कलियुग में सतयुग का आभास कराती है। नदी में डुबकी लगाते समय उनके उत्तरेय में 12 शालिग्राम आ गए तो गोपाल भट्ट ने उन्हें जल में विसर्जित कर दिया किंतु उन्होंने जैसे ही दुबारा डुबकी लगाई उनके उत्तरीय में न केवल 12 शालिग्राम फिर से आ गए बल्कि उन्हें एक आवाज भी सुनाई पड़ी जिसमें कहा गया था कि वह उन्हे वृन्दावन धाम ले जाएं और वहीं पर उनकी आराधना करें। इसके बाद गोपाल भट्ट इसे भगवत आज्ञा मानकर वृन्दावन ले आए तथा इसी शालिग्राम से शोडशागुल परिमाण नवनीत नीरद श्याम विग्रह अर्थात श्री राधारमण महाराज का दिव्य विग्रह प्रकट हुआ

वृन्दावन के इस प्रसिद्ध मन्दिर में श्री गोपाल भक्त गोस्वामी जी के उपास्य ठाकुर हैं। यहाँ श्री राधारमण जी, ललित त्रिभंगी मूर्ति के दर्शन हैं। 1599 विक्रम संवत वैशाख शुक्ला पूर्णिमा की बेला में शालिगराम से श्री गोपालभट्ट प्रेम वशीभूत हो ब्रज निधि श्री राधारमण विग्रह के रूप में अवतरित हुए।

एक बार एक व्यक्ति ने  गेंदे के पुष्पों से चारों तरफ से सजे बीच में विराजमान शालिगराम भगवान को देखकर गोस्वामी जी ने व्यंग करते हुए कहा कि तुम्हारे शालिगराम तो ऐसे लग रहे है जैसे कढ़ी में बैंगन पड़ा हो

यह सुनकर भक्त गोस्वामी जी के मन में यह प्रबल अभिलाषा हुई कि यदि शालग्राम ठाकुर जी के हस्त-पद होते तो मैं उनकी विविध प्रकार से अलंकृत कर सेवा करता, उन्हीं झूले पर झुलाता। भक्तवत्सल प्रभु अपने भक्त की मनोकामना पूर्ण करने के लिए उसी रात में ही ललितत्रिभंग श्री राधारमण रूप में परिवर्तित हो गये। भक्त की इच्छा पूर्ण हुई। भट्ट गोस्वामी ने नानाविध अलंकारों से भूषितकर उन्हें झूले में झुलाया तथा बड़े लाड़-प्यार से उन्हें भोगराग अर्पित किया।
श्रीराधारमण विग्रह की पीठ शालग्राम शिला जैसी दीखती है। अर्थात पीछे से दर्शन करने में शालग्राम शिला जैसे ही लगते हैं।
द्वादश अंगुल का श्रीविग्रह होने पर भी बड़ा ही मनोहर दर्शन है।
श्रीराधारमण विग्रह का श्री मुखारविन्द गोविन्द जी के समान, वक्षस्थल श्री गोपीनाथ के समान तथा चरणकमल मदनमोहन जी के समान हैं। इनके दर्शनों से तीनों विग्रहों के दर्शन का फल प्राप्त होता है।

सेवाप्राकट्य ग्रन्थ के अनुसार सम्वत 1599 में शालग्राम शिला से राधारमण जी प्रकट हुए।

उसी वर्ष वैशाख की पूर्णिमा तिथि में उनका अभिषेक हुआ था।
राधारमणजी के साथ श्रीराधाजी का विग्रह नहीं है। परन्तु उनके वाम भाग में सिंहासन पर गोमती चक्र की पूजा होती है।
श्रीहरिभक्तिविलास में गोमतीचक्र के साथ ही शालग्राम शिला के पूजन की विधि दी गई है।

श्रीराधारमण मन्दिर के पास ही दक्षिण में श्रीगोपालभट्टगोस्वामी की समाधि तथा राधारमण के प्रकट होने का स्थान दर्शनीय है।
अन्य विग्रहों की भाँति श्री राधारमण जी वृन्दावन से कहीं बाहर नहीं गये।

🙏🌹 राधे राधे 🙏🌹

Sunday, August 25, 2019

वृन्दावन में नंदोत्सव

आज सायं रँगजी मन्दिर में नंदोत्सव के अंतर्गत लठ्ठे का मेला आयोजित किया गया





Friday, August 23, 2019

: जय श्री राधे श्री कृष्ण जन्मोत्सव 24 अगस्त 2019 को दिन शनिवार को है 23 अगस्त को सुबह के समय सप्तमी का उदय है 8:30 बजे के बाद अष्टमी का उदय हो रहा है कहा जाता है कि जो तिथि का उदय हो उसी का अंत माना जाता है 24 तारीख को सुबह के समय अष्टमी का उदय सूर्योदय के समय उसके बाद नवमी लग जा रहा है परंतु अष्टमी के उदय होने के कारण पूरा दिन अष्टमी का माना जाएगा और रोहिणी नक्षत्र है इसलिए अर्धरात्रि को रोहिणी नक्षत्र होगा भगवान श्री कृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ है मान्यता अनुसार रोहिणी नक्षत्र का महत्व 24 तारीख को अर्धरात्रि को मिल रहा है तो जन्मोत्सव 24 को ही मनायेंगे ।।
उदाहरणार्थ जैसा मैंने प्रयोग किया है।




*श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत निर्णय*
ब्रह्मवैवर्त पुराण में लिखा है - *वर्जनीया प्रयत्नेन सप्तमीसंयुताष्टमी* अर्थात सप्तमी से संयुक्त अष्टमी का प्रयत्न पूर्वक त्याग कर देना चाहिये ।


 *कलाकाष्ठामुहूर्तापि यदा कृष्णाष्टमी तिथि:। नवम्यां सैव ग्राह्या स्यात्सप्तमीसंयुता नहि।।*
 *वैष्णववास्तु "अर्द्धरात्रिव्यापिनिमपी रोहिणीयुतामपि सप्तमीविद्धान परित्यज्य नवमीयुतैव ग्राह्या"*  इति नृसिंह परिचर्याद्यनुयायिन:
*"अग्नि पुराण"* के अनुसार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के संबंध में इस प्रकार कहा गया है ~

वर्जनीय प्रयत्नेन सप्तमी संयुता अष्टमी।
बिना ऋक्षेण कर्तव्या नवमी संयुता अष्टमी।
*अर्थात:-* जिस दिन सूर्योदय में सप्तमी बेधित  अष्टमी हो और रोहिणी नक्षत्र  हो तो उस दिन व्रत नहीं रखना चाहिए। नवमी युक्त अष्टमी को ही व्रत रखना चाहिए।

*पद्म पुराण वर्णित है~*
पुत्रां हन्ति पशून हन्ति, हन्ति राष्ट्रम सराजकम।
हन्ति जातान जातानश्च, सप्तमी षित अष्टमी।
*अर्थात:-*  अष्टमी यदि सप्तमी विद्धा हो और उसमें उपवास करें तो पुत्र , पशु, राज्य ,राष्ट्र , जात, अजात,सबको नष्ट कर देती है।।

*स्कन्द पुराण के अनुसार:-*
पालवेधेपि विप्रेन्द्र  सप्तम्यामष्टमी त्यजेत।
सुरया बिंदुन स्पृष्टम गंगांभः कलशं यथा।
*अर्थात~* जिस प्रकार गंगा जल से भरा कलश एक बूंद मदिरा से दूषित हो जाता है उसी प्रकार लेश मात्र सप्तमी हो तो वह अष्टमी व्रत उपवास के लिए दूषित हो जाती है।

इन पौराणिक आख्यानों को ध्यान में रखते हुए जन्माष्टमी व्रत एवं जन्मोत्सव *24* /अगस्त/2019 शनिवार को ही मनाना उचित प्रतीत हो रहा है |अजन्मा के जन्मदिन के लिए सज संवर कर तैयार हो गया बृज








Wednesday, August 21, 2019

टटिया स्थान, तटीय स्थान, प्राचीन वृन्दावन का स्वरूप

"टटिया स्थान वृंदावन"

        श्री रंगजी मन्दिर के दाहिने हाथ यमुना जी के जाने वाली पक्की सड़क के आखिर में ही यह रमणीय टटिया स्थान है। विशाल भूखंड पर फैला हुआ है, किन्तु कोई दीवार,पत्थरो की घेराबंदी नहीं है। केवल बाँस की खपच्चियाँ या टटियाओ से घिरा हुआ है इसलिए टटिया स्थान के नाम से प्रसिद्ध है।
         संगीत शिरोमणि स्वामी हरिदास जी महाराजकी तपोस्थली है। यह एक ऐसा स्थल है जहाँ के हर वृक्ष और पत्तों में भक्तो ने राधा कृष्ण की अनुभूति की है, सन्त कृपा से राधा नाम पत्ती पर उभरा हुआ देखा है।

                                   स्थापना

        स्वामी श्री हरिदास जी की शिष्य परंपरा के सातवे आचार्य श्री ललित किशोरी जी ने इस भूमि को अपनी भजन स्थली बनाया था। उनके शिष्य महन्त श्री ललितमोहनदास जी ने सं १८२३ में इस स्थान पर ठाकुर श्री मोहिनी बिहारी जी को प्रतिष्ठित किया था।  तभी चारो ओर बाँस की टटिया लगायी गई थी तभी से यहाँ के सेवा पुजाधिकारी विरक्त साधु ही चले आ रहे है। उनकी विशेष वेशभूषा भी है।

                                    विग्रह

          श्रीमोहिनी बिहारी जी का श्री विग्रह प्रतिष्ठित है। मन्दिर का अनोखा नियम ऐसा सुना जाता है कि श्री ललितमोहिनिदास जी के समय इस स्थान का यह नियम था कि जो भी आटा-दाल-घी दूध भेट में आवे उसे उसी दिन ही ठाकुर भोग ओर साधु सेवा में लगाया जाता है। संध्या के समय के बाद सबके बर्तन खाली करके धो माज के उलटे करके रख दिए जाते है, कभी भी यहाँ अन्न सामग्री कि कमी नहीं रहती थी।
        एक बार दिल्ली के यवन शासक ने जब यह नियम सुना तो परीक्षा के लिए अपने एक हिंदू कर्मचारी के हाथ एक पोटली में सच्चे मोती भर कर सेवा के लिए संध्या के बाद रात को भेजे। श्री महन्त जी बोले- वाह खूब समय पर आप भेट लाये हैं। महन्त जी ने तुरन्त उन्हें खरल में पिसवाया और पान में भरकर श्री ठाकुर जी को भोग में अर्पण कर दिया कल के लिए कुछ नहीं रखा। संग्रह रहित विरक्त थे श्री महन्त जी। उनका यह भी नियम था कि चाहे कितने मिष्ठान व्यंजन पकवान भोग लगे स्वयं उनमें से प्रसाद रूप में कणिका मात्र ग्रहण करते सब पदार्थ सन्त सेवा में लगा देते ओर स्वयं मधुकरी करते।

                               विशेष प्रसाद

        इस स्थान के महन्त पदासीन महानुभाव अपने स्थान से बाहर कही भी नहीं जाते स्वामी हरिदास जी के आविर्भाव दिवस श्री राधाष्टमी के दिन यहाँ स्थानीय और आगुन्तक भक्तों कि विशाल भीड़ लगती है। श्री स्वामी जी के कडुवा और दंड के उस दिन सबको दर्शन लाभ होता है। उस दिन विशेष प्रकार कि स्वादिष्ट अर्बी का भोग लगता है और बँटता है। जो दही और घी में विशेष प्रक्रिया से तैयार की जाती है। यहाँ का अर्बी प्रसाद प्रसिद्ध है। इसे सखी संप्रदाय का प्रमुख
स्थान माना जाता है।

                                 एक प्रसंग

         एक दिन श्रीस्वामी ललितमोहिनी देव जी सन्त-सेवा के पश्चात प्रसाद पाकर विश्राम कर रहे थे, किन्तु उनका मन कुछ उद्विग्न सा था। वे बार-बार आश्रम के प्रवेश द्वार की तरफ देखते, वहाँ जाते और फिर लौट आते। वहाँ रह रहे सन्त ने पूंछा- "स्वामी जी ! किसको देख रहे हैं, आपको किसका इन्तजार है ?" स्वामी जी बोले- एक मुसलमान भक्त है, श्री युगल किशोर जी की मूर्तियाँ लाने वाला है उसका इन्तजार कर रहा हूँ। इतने मे वह मुसलमान भक्त सिर पर एक घड़ा लिए वहाँ आ पहुँचा और दो मूर्तियों को ले आने की बात कही। श्री स्वामी जी के पूछने पर उसने बताया, कि डींग के किले में भूमि कि खुदाई चल रही है, मैं वहाँ एक मजदूर के तौर पर खुदाई का काम कई दिन से कर रहा हूँ। कल खुदाई करते में मुझे यह घड़ा दीखा तो मैंने इसे मोहरों से भरा जान कर फिर दबा दिया ताकि साथ के मजदूर इसे ना देख ले। रात को फिर मै इस कलश को घर ले आया खुदा का लाख-लाख शुक्र अदा करते हुए कि, अब मेरी परिवार के साथ जिंदगी शौक मौज से बसर होगी घर आकर जब कलश में देखा तो इससे ये दो मूर्तियाँ निकली, एक फूटी कौड़ी भी साथ ना थी। स्वामी जी- इन्हें यहाँ लाने के लिए तुम्हे किसने कहा ? मजदूर- जब रात को मुझे स्वप्न में इन प्रतिमाओं ने आदेश दिया कि, हमें सवेरे वृंदावन में टटिया स्थान पर श्री स्वामी जी के पास पहुँचा दो, इसलिए मैं इन्हें लेकर आया हूँ। स्वामी जी ने मूर्तियों को निकाल लिया और उस मुसलमान भक्त को खाली घड़ा लौटते हुए कहा "भईया ! तुम बड़े भाग्यवान हो भगवान तुम्हारे सब कष्ट दूर करेगे।" वह मुसलमान मजदूर खाली घड़ा लेकर घर लौटा, रास्ते में सोच रहा था कि, इतना चमत्कारी महात्मा मुझे खाली हाथ लौटा देगा- मैंने तो स्वप्न में भी ऐसा नहीं सोचा था। आज की मजदूरी भी मारी गई। घर पहुँचा एक कौने में घड़ा धर दिया और उदास होकर एक टूटे मांझे पर आकर सो गया। पत्नी ने पूछा- हो आये वृंदावन ? क्या लाये फकीर से ? भर दिया घड़ा अशर्फिर्यो से ? क्या जवाव देता इस व्यंग का ? उसने आँखे बंद करके करवट बदल ली। पत्नी ने कोने में घड़ा रखा देखा तो लपकी उस तरफ देखती है कि, घड़ा तो अशर्फियों से लबालव भरा है, आनंद से नाचती हुई पति से आकर बोली मियाँ वाह ! इतनी दौलत होते हुए भी क्या आप थोड़े से मुरमुरे ना ला सके बच्चो के लिए ? अशर्फियों का नाम सुनते ही भक्त चौंककर खड़ा हुआ और घड़े को देखकर उसकी आँखों से अश्रु धारा बह निकली, बोला मै किसका शुक्रिया करूँ, खुदा का, या उस फकीर का जिसने मुझे इस कदर संपत्ति बख्शी। फिर इन अशर्फिर्यो के बोझे को सिर पर लाद कर लाने से भी मुझे मुक्त रखा।

Sunday, August 18, 2019

करील की कुंजे, श्री निधिवन एवं सेवा कुन्ज

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               *श्री राधा श्री राधा श्री राधा*

               *जै जै श्री हित हरिवंश*

*सेवा कुंज वृन्दावन के प्रसिद्ध एवं प्राचीन मंदिरों में से एक है, इसे आप सुप्रीम कोर्ट भी कह सकते है क्योंकि  तीन लोक के स्वामी भगवान कृष्ण यहां राधा रानी के चरण सेवा कर रहे हैं ऐसा माना जाता है कि यह वह स्थल है जहाँ भगवान क़ृष्ण राधा गोपियों के साथ रासलीला रचते है ।*

*रात को मंदिर में कोई नहीं रहता है जो रह जाते हैं मर जाते हैं पागल भरे गूंगे हो जाते हैं शाम को शयन आरती के बाद  फूलों की सैया लगती है जिस पर लड्डू दातुन पानमाला इत्र चंदन रखते हैं*

 *सुबह मंगला आरती में 5:00 बजे दर्शन होता है लड्डू टूटा हुआ दातुन की हुई पान चबा हुआ फूलों की सैया दबी हुई मिलती है यह दर्शन मंगला आरती में आने से आज भी भक्त लोगों को देखने के लिए मिलता है*

*यह दिव्य दर्शन करने वाले पर श्री जी की खूब कृपा बरसती है अन्न वाले को अन्न धन वाले को धन और भक्ति वाले को भक्ति की कृपा प्राप्त होती है*

*कहते है न कि राधे तुम बड़ी भागनी कोन तपस्या क़ीन तीन लोक तारन तरन सो तेरे आधीन*

*यह वो दिव्य स्थल है जँहा ठाकुर जी स्वयंम श्री जी की सेवा में है चरण सेवा से ही इस मंदिर का नाम सेवा कुंज हुआ*

*दिव्य चित्रपट में वँहा दर्शन है श्री जी के चरण सेवा करते हुए ठाकुर जी की पूरे विश्व मे ऐसी छवि चित्रपट में और कंही नही है*

*सावन के पावन महीनें में इस दिव्य मंदिर के दर्शन करने ब्रज अवश्य पधारें।*राधा अष्टमी तिथि राधा रानी के प्राकट्य उत्सव भी विशेष रूप से मनाया जाता है

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