राधारमण मंदिर स्थित प्रतिमा के अवतरण की कथा
वृन्दावन के इस प्राचीन विग्रह के स्वयं प्राकटय होने के बारे में गोस्वामी ने बताया कि दक्षिण में कावेरी के तट पर श्रीरंगम का विशाल मंदिर है। मंदिर के महंत महान विद्वान अर्चक वेंकट भट्ट थे। चैतन्य महाप्रभु ने अपनी दक्षिण यात्रा के समय वेंकट भट्ट के यहां ही जब चातुर्मास किया था तो वेंकट भट्ट के पुत्र गोपाल भट्ट ने उनके इस प्रकल्प में बहुत अधिक सहयोग किया था।
चार माह बीतने के बाद जब चैतन्य महाप्रभु चलने लगे तो गोपाल भट्ट भी उनके साथ जाने को तैयार हो गए। इस पर चैतन्य महाप्रभु ने वेंकट भट्ट को आज्ञा दी कि वे गोपाल भट्ट की शिक्षा दीक्षा पूरी कराकर उन्हें वृन्दावन भेज दें। उन्होंने उनसे यह भी कहा था कि गोपाल भट्ट को वे एक बार नेपाल में गंडकी नदी में स्नान के लिए अवश्य भेजें क्योंकि वहां पर इन्हें प्रभु का अभूतपूर्व आशीर्वाद मिलेगा।
नेपाल की गंडकी नदी से मिले थे 12 शालिग्राम
आचार्य दिनेश चन्द्र गोस्वामी ने बताया कि अपनी शिक्षा दीक्षा पूरी करके अपने माता पिता की आज्ञा लेकर गोपाल भट्ट तीर्थाटन के लिए चल पड़े। भक्ति सिंद्धांत का प्रचार करते करते वह नेपाल पहुंचे। वहां पर गण्डकी नदी में स्नान करने के दौरान एक ऎसी घटना घटी जो प्रत्येक भगवत भक्त को कलियुग में सतयुग का आभास कराती है। नदी में डुबकी लगाते समय उनके उत्तरेय में 12 शालिग्राम आ गए तो गोपाल भट्ट ने उन्हें जल में विसर्जित कर दिया किंतु उन्होंने जैसे ही दुबारा डुबकी लगाई उनके उत्तरीय में न केवल 12 शालिग्राम फिर से आ गए बल्कि उन्हें एक आवाज भी सुनाई पड़ी जिसमें कहा गया था कि वह उन्हे वृन्दावन धाम ले जाएं और वहीं पर उनकी आराधना करें। इसके बाद गोपाल भट्ट इसे भगवत आज्ञा मानकर वृन्दावन ले आए तथा इसी शालिग्राम से शोडशागुल परिमाण नवनीत नीरद श्याम विग्रह अर्थात श्री राधारमण महाराज का दिव्य विग्रह प्रकट हुआ
वृन्दावन के इस प्रसिद्ध मन्दिर में श्री गोपाल भक्त गोस्वामी जी के उपास्य ठाकुर हैं। यहाँ श्री राधारमण जी, ललित त्रिभंगी मूर्ति के दर्शन हैं। 1599 विक्रम संवत वैशाख शुक्ला पूर्णिमा की बेला में शालिगराम से श्री गोपालभट्ट प्रेम वशीभूत हो ब्रज निधि श्री राधारमण विग्रह के रूप में अवतरित हुए।
एक बार एक व्यक्ति ने गेंदे के पुष्पों से चारों तरफ से सजे बीच में विराजमान शालिगराम भगवान को देखकर गोस्वामी जी ने व्यंग करते हुए कहा कि तुम्हारे शालिगराम तो ऐसे लग रहे है जैसे कढ़ी में बैंगन पड़ा हो
यह सुनकर भक्त गोस्वामी जी के मन में यह प्रबल अभिलाषा हुई कि यदि शालग्राम ठाकुर जी के हस्त-पद होते तो मैं उनकी विविध प्रकार से अलंकृत कर सेवा करता, उन्हीं झूले पर झुलाता। भक्तवत्सल प्रभु अपने भक्त की मनोकामना पूर्ण करने के लिए उसी रात में ही ललितत्रिभंग श्री राधारमण रूप में परिवर्तित हो गये। भक्त की इच्छा पूर्ण हुई। भट्ट गोस्वामी ने नानाविध अलंकारों से भूषितकर उन्हें झूले में झुलाया तथा बड़े लाड़-प्यार से उन्हें भोगराग अर्पित किया।
श्रीराधारमण विग्रह की पीठ शालग्राम शिला जैसी दीखती है। अर्थात पीछे से दर्शन करने में शालग्राम शिला जैसे ही लगते हैं।
द्वादश अंगुल का श्रीविग्रह होने पर भी बड़ा ही मनोहर दर्शन है।
श्रीराधारमण विग्रह का श्री मुखारविन्द गोविन्द जी के समान, वक्षस्थल श्री गोपीनाथ के समान तथा चरणकमल मदनमोहन जी के समान हैं। इनके दर्शनों से तीनों विग्रहों के दर्शन का फल प्राप्त होता है।
सेवाप्राकट्य ग्रन्थ के अनुसार सम्वत 1599 में शालग्राम शिला से राधारमण जी प्रकट हुए।
उसी वर्ष वैशाख की पूर्णिमा तिथि में उनका अभिषेक हुआ था।
राधारमणजी के साथ श्रीराधाजी का विग्रह नहीं है। परन्तु उनके वाम भाग में सिंहासन पर गोमती चक्र की पूजा होती है।
श्रीहरिभक्तिविलास में गोमतीचक्र के साथ ही शालग्राम शिला के पूजन की विधि दी गई है।
श्रीराधारमण मन्दिर के पास ही दक्षिण में श्रीगोपालभट्टगोस्वामी की समाधि तथा राधारमण के प्रकट होने का स्थान दर्शनीय है।
अन्य विग्रहों की भाँति श्री राधारमण जी वृन्दावन से कहीं बाहर नहीं गये।
🙏🌹 राधे राधे 🙏🌹
वृन्दावन के इस प्राचीन विग्रह के स्वयं प्राकटय होने के बारे में गोस्वामी ने बताया कि दक्षिण में कावेरी के तट पर श्रीरंगम का विशाल मंदिर है। मंदिर के महंत महान विद्वान अर्चक वेंकट भट्ट थे। चैतन्य महाप्रभु ने अपनी दक्षिण यात्रा के समय वेंकट भट्ट के यहां ही जब चातुर्मास किया था तो वेंकट भट्ट के पुत्र गोपाल भट्ट ने उनके इस प्रकल्प में बहुत अधिक सहयोग किया था।
चार माह बीतने के बाद जब चैतन्य महाप्रभु चलने लगे तो गोपाल भट्ट भी उनके साथ जाने को तैयार हो गए। इस पर चैतन्य महाप्रभु ने वेंकट भट्ट को आज्ञा दी कि वे गोपाल भट्ट की शिक्षा दीक्षा पूरी कराकर उन्हें वृन्दावन भेज दें। उन्होंने उनसे यह भी कहा था कि गोपाल भट्ट को वे एक बार नेपाल में गंडकी नदी में स्नान के लिए अवश्य भेजें क्योंकि वहां पर इन्हें प्रभु का अभूतपूर्व आशीर्वाद मिलेगा।
नेपाल की गंडकी नदी से मिले थे 12 शालिग्राम
आचार्य दिनेश चन्द्र गोस्वामी ने बताया कि अपनी शिक्षा दीक्षा पूरी करके अपने माता पिता की आज्ञा लेकर गोपाल भट्ट तीर्थाटन के लिए चल पड़े। भक्ति सिंद्धांत का प्रचार करते करते वह नेपाल पहुंचे। वहां पर गण्डकी नदी में स्नान करने के दौरान एक ऎसी घटना घटी जो प्रत्येक भगवत भक्त को कलियुग में सतयुग का आभास कराती है। नदी में डुबकी लगाते समय उनके उत्तरेय में 12 शालिग्राम आ गए तो गोपाल भट्ट ने उन्हें जल में विसर्जित कर दिया किंतु उन्होंने जैसे ही दुबारा डुबकी लगाई उनके उत्तरीय में न केवल 12 शालिग्राम फिर से आ गए बल्कि उन्हें एक आवाज भी सुनाई पड़ी जिसमें कहा गया था कि वह उन्हे वृन्दावन धाम ले जाएं और वहीं पर उनकी आराधना करें। इसके बाद गोपाल भट्ट इसे भगवत आज्ञा मानकर वृन्दावन ले आए तथा इसी शालिग्राम से शोडशागुल परिमाण नवनीत नीरद श्याम विग्रह अर्थात श्री राधारमण महाराज का दिव्य विग्रह प्रकट हुआ
वृन्दावन के इस प्रसिद्ध मन्दिर में श्री गोपाल भक्त गोस्वामी जी के उपास्य ठाकुर हैं। यहाँ श्री राधारमण जी, ललित त्रिभंगी मूर्ति के दर्शन हैं। 1599 विक्रम संवत वैशाख शुक्ला पूर्णिमा की बेला में शालिगराम से श्री गोपालभट्ट प्रेम वशीभूत हो ब्रज निधि श्री राधारमण विग्रह के रूप में अवतरित हुए।
एक बार एक व्यक्ति ने गेंदे के पुष्पों से चारों तरफ से सजे बीच में विराजमान शालिगराम भगवान को देखकर गोस्वामी जी ने व्यंग करते हुए कहा कि तुम्हारे शालिगराम तो ऐसे लग रहे है जैसे कढ़ी में बैंगन पड़ा हो
यह सुनकर भक्त गोस्वामी जी के मन में यह प्रबल अभिलाषा हुई कि यदि शालग्राम ठाकुर जी के हस्त-पद होते तो मैं उनकी विविध प्रकार से अलंकृत कर सेवा करता, उन्हीं झूले पर झुलाता। भक्तवत्सल प्रभु अपने भक्त की मनोकामना पूर्ण करने के लिए उसी रात में ही ललितत्रिभंग श्री राधारमण रूप में परिवर्तित हो गये। भक्त की इच्छा पूर्ण हुई। भट्ट गोस्वामी ने नानाविध अलंकारों से भूषितकर उन्हें झूले में झुलाया तथा बड़े लाड़-प्यार से उन्हें भोगराग अर्पित किया।
श्रीराधारमण विग्रह की पीठ शालग्राम शिला जैसी दीखती है। अर्थात पीछे से दर्शन करने में शालग्राम शिला जैसे ही लगते हैं।
द्वादश अंगुल का श्रीविग्रह होने पर भी बड़ा ही मनोहर दर्शन है।
श्रीराधारमण विग्रह का श्री मुखारविन्द गोविन्द जी के समान, वक्षस्थल श्री गोपीनाथ के समान तथा चरणकमल मदनमोहन जी के समान हैं। इनके दर्शनों से तीनों विग्रहों के दर्शन का फल प्राप्त होता है।
सेवाप्राकट्य ग्रन्थ के अनुसार सम्वत 1599 में शालग्राम शिला से राधारमण जी प्रकट हुए।
उसी वर्ष वैशाख की पूर्णिमा तिथि में उनका अभिषेक हुआ था।
राधारमणजी के साथ श्रीराधाजी का विग्रह नहीं है। परन्तु उनके वाम भाग में सिंहासन पर गोमती चक्र की पूजा होती है।
श्रीहरिभक्तिविलास में गोमतीचक्र के साथ ही शालग्राम शिला के पूजन की विधि दी गई है।
श्रीराधारमण मन्दिर के पास ही दक्षिण में श्रीगोपालभट्टगोस्वामी की समाधि तथा राधारमण के प्रकट होने का स्थान दर्शनीय है।
अन्य विग्रहों की भाँति श्री राधारमण जी वृन्दावन से कहीं बाहर नहीं गये।
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