.................मुड़िया पूर्णिमा..............
.............श्रद्धालुओं का उमड़ा सैलाब
सप्तकोसीय परिक्रमा मार्ग पर नजर आ रहे भक्त ही भक्त
!! परिक्रमा मार्ग में कई चमत्कार होते साक्षात !!
!! पग-पग समेटे है कृष्ण काल की पौराणिकता !!
गोवर्धन। भगवान श्रीकृष्ण की जिन लीलाओं को हमने महाकाव्यों में पढ़ा है, विद्वानों से सुना है, गिरिराज परिक्रमा में उन लीलाओं और उनसे जुड़ी पौराणिक कथाएं आज भी साक्षात होती हैं। ऐसे में इनके दर्शन मात्र से ही कोटि-कोटि पुण्य लाभ अर्जित होता है।
मुड़िया पूर्णिमा पर गिरिराज जी 21 किलोमीटर परिक्रमा करने की मानो होड़ मच जाती है। इस बीच देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु इस अक्षुण्ण पुण्य को हासिल करने के लिए आते हैं। मार्ग में कई पौराणिक स्थल ऐसे है, जो आज भी कृष्णकालीन युग के करीब नजर आते है। बड़ी परिक्रमा की शुरूआत में ही तलहटी में गिरिराज की परिक्रमा से अनूठा अनुभव हासिल होता है। तलहटी में ही लुक-लुक दाऊजी का प्राचीन मंदिर है। बताया जाता है कि यहां श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ लुका-छुपी का खेल खेलते थे।
यहीं पर सिंदूर शिला और काजल शिला भी है। इन शिलाओं के पत्थर घिसने से लाल रंग निकलता है। किवदंति है भगवान श्रीकृष्ण ने इसी शिला से सिंदूर लेकर राधा जी की मांग में भरा था। यहीं काजल शिला भी है, जिससे राधा जी को काजल लगाया था। यहां दर्शन मात्र से ही पुण्य लाभ अर्जित होता है। तलहटी में ही गिरिराज पर्वत के पत्थरों से घर बनाने की पुरानी परंपरा है। बताया जाता है जो श्रद्धालु सच्चे मन से यहां घर बनाकर जाते है तो प्रभु उनके घर का सपना अवश्य पूरा करते है।
पूंछरी के लौंठा पर हाजिरी लगाये बिना परिक्रमा अधूरी मानी जाती है। यहां से जतीपुरा मुखारबिंद होते हुए बड़ी परिक्रमा समाप्त होती है। इसके बाद राधाकुंड परिक्रमा में मानसी गंगा श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहती है। एक बार नंद बाबा ने इंद्र की बजाय गोवर्धन की पूजा शुरू कर दी, अर्चना के श्रीकृष्ण जल मांगा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बांसुरी से गंगा को प्रकट किया। मन से प्रकट होने के चलते इसका नाम मानसी गंगा पड़ा। परिक्रमा में कुसुम सरोवर पूर्व में कुसुम वन होता था। यहां राधा जी सांझी शृंगार के लिये फूल लेने आती थी। यहां पारस पत्थर गिरने के चलते काई नही लगती है।
.............श्रद्धालुओं का उमड़ा सैलाब
सप्तकोसीय परिक्रमा मार्ग पर नजर आ रहे भक्त ही भक्त
!! परिक्रमा मार्ग में कई चमत्कार होते साक्षात !!
!! पग-पग समेटे है कृष्ण काल की पौराणिकता !!
गोवर्धन। भगवान श्रीकृष्ण की जिन लीलाओं को हमने महाकाव्यों में पढ़ा है, विद्वानों से सुना है, गिरिराज परिक्रमा में उन लीलाओं और उनसे जुड़ी पौराणिक कथाएं आज भी साक्षात होती हैं। ऐसे में इनके दर्शन मात्र से ही कोटि-कोटि पुण्य लाभ अर्जित होता है।
मुड़िया पूर्णिमा पर गिरिराज जी 21 किलोमीटर परिक्रमा करने की मानो होड़ मच जाती है। इस बीच देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु इस अक्षुण्ण पुण्य को हासिल करने के लिए आते हैं। मार्ग में कई पौराणिक स्थल ऐसे है, जो आज भी कृष्णकालीन युग के करीब नजर आते है। बड़ी परिक्रमा की शुरूआत में ही तलहटी में गिरिराज की परिक्रमा से अनूठा अनुभव हासिल होता है। तलहटी में ही लुक-लुक दाऊजी का प्राचीन मंदिर है। बताया जाता है कि यहां श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ लुका-छुपी का खेल खेलते थे।
यहीं पर सिंदूर शिला और काजल शिला भी है। इन शिलाओं के पत्थर घिसने से लाल रंग निकलता है। किवदंति है भगवान श्रीकृष्ण ने इसी शिला से सिंदूर लेकर राधा जी की मांग में भरा था। यहीं काजल शिला भी है, जिससे राधा जी को काजल लगाया था। यहां दर्शन मात्र से ही पुण्य लाभ अर्जित होता है। तलहटी में ही गिरिराज पर्वत के पत्थरों से घर बनाने की पुरानी परंपरा है। बताया जाता है जो श्रद्धालु सच्चे मन से यहां घर बनाकर जाते है तो प्रभु उनके घर का सपना अवश्य पूरा करते है।
पूंछरी के लौंठा पर हाजिरी लगाये बिना परिक्रमा अधूरी मानी जाती है। यहां से जतीपुरा मुखारबिंद होते हुए बड़ी परिक्रमा समाप्त होती है। इसके बाद राधाकुंड परिक्रमा में मानसी गंगा श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहती है। एक बार नंद बाबा ने इंद्र की बजाय गोवर्धन की पूजा शुरू कर दी, अर्चना के श्रीकृष्ण जल मांगा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बांसुरी से गंगा को प्रकट किया। मन से प्रकट होने के चलते इसका नाम मानसी गंगा पड़ा। परिक्रमा में कुसुम सरोवर पूर्व में कुसुम वन होता था। यहां राधा जी सांझी शृंगार के लिये फूल लेने आती थी। यहां पारस पत्थर गिरने के चलते काई नही लगती है।
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