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Thursday, December 8, 2011

रंग नाथ जी का मन्दिर 
श्री सम्प्रदाय के संस्थापक रामानुजाचार्य के विष्णु-स्वरूप भगवान रंगनाथ या रंगजी के नाम से रंग जी का मन्दिर सेठ लखमीचन्द के भाई सेठ गोविन्ददास और राधाकृष्ण दास द्वारा निर्माण कराया गया था। उनके महान गुरु संस्कृत के उद्भट आचार्य स्वामी रंगाचार्य द्वारा दिये गये मद्रास के रंग नाथ मन्दिर की शैली के मानचित्र के आधार पर यह बना था। इसकी लागत पैंतालीस लाख रुपये आई थी। इसकी बाहरी दीवार की लम्बाई 773 फीट और चौड़ाई 440 फीट है। मन्दिर के अतिरिक्त एक सुन्दर सरोवर और एक बाग़ भी अलग से इससे संलग्न किया गया है। मन्दिर के द्वार का गोपुर काफ़ी ऊँचा है। भगवान रंगनाथ के सामने साठ फीट ऊँचा और लगभग बीस फीट भूमि के भीतर धँसा हुआ तांबे का एक ध्वज स्तम्भ बनाया गया। इस अकेले स्तम्भ की लागत दस हज़ार रुपये आई थी। मन्दिर का मुख्य द्वार 93 फीट ऊँचे मंडप से ढका हुआ है। यह मथुरा शैली का है। इससे थोड़ी दूर एक छत से ढका हुआ निर्मित भवन है, जिसमें भगवान का रथ रखा जाता है। यह लकड़ी का बना हुआ है और विशालकाय है। यह रथ वर्ष में केवल एक बार ब्रह्मोत्सव के समय चैत्र में बाहर निकाला जाता है। यह ब्रह्मोत्सव-मेला दस दिन तक लगता है। प्रतिदिन मन्दिर से भगवान रथ में जाते हैं। सड़क से चल कर रथ 690 गज़ रंगजी के बाग़ तक जाता है जहाँ स्वागत के लिए मंच बना हुआ है। इस जलूस के साथ संगीत, सुगन्ध सामग्री और मशालें रहती हैं। जिस दिन रथ प्रयोग मे लाया जाता है, उस दिन अष्टधातु की मूर्ति रथ के मध्य स्थापित की जाती है। इसके दोनों ओर चौरधारी ब्राह्मण खड़े रहते हैं। भीड़ के साथ सेठ लोग भी जब-तब रथ के रस्से को पकड कर खींचतें हैं। लगभग ढ़ाई घन्टे के अन्तराल में काफ़ी जोर लगाकर यह दूरी पार कर ली जाती है। अगामी दिन शाम की बेला में आतिशबाजी का शानदार प्रदर्शन किया जाता है। आसपास के दर्शनार्थियों की भीड़ भी इस अवसर पर एकत्र होती है। अन्य दिनों जब रथ प्रयोग में नहीं आता तो भगवान की यात्रा के लिए कई वाहन रहते हैं- कभी जड़ाऊ पालकी तो कभी पुण्य कोठी, तो कभी सिंहासन होता है। कभी कदम्ब तो कभी कल्पवृक्ष रहता है। कभी-कभी किसी उपदेवता को भी वाहन के रूप में प्रयोग किया जाता है। जैसे- सूरज, गरुड़, हनुमान या शेषनाग। कभी घोड़ा, हाथी, सिंह, राजहंस या पौराणिक शरभ जैसे चतुष्पद भी प्रयोग में लाये जाते हैं।
इस समारोह में लगभग पॉँच हज़ार रुपये की धनराशि व्यय की जाती है। वर्ष भर के रख-रखाव का व्यय सत्तावन हज़ार से कम नहीं होता। इसमें से तीस हज़ार की सबसे बड़ी मद तो भोग में ही ख़र्च होती है। भगवान के सामने रखा जाने वाला यह भोग पुजारियों द्वारा प्रयोग कर लिया जाता है या दान कर दिया जाता है। प्रतिदिन पाँच सौ श्री संम्प्रदाय अनुयायी वैष्णवों को जिमाया जाता है। प्रत्येक सवेरे दस बजे तक आटे का पात्र किसी भी प्रार्थना कर्त्ता को दे दिया जाता है। मन्दिर से 33 गाँवों की जायदाद लगी हुई है। इससे एक लाख सत्रह हज़ार रुपये की आय होती है। इसमें से शासन चौसठ हज़ार रुपये लेता है। इन तैंतीस गाँवों में से चौथाई वृन्दावन समेत तेरह गाँव मथुरा में पड़ते हैं और बीस आगरा ज़िले में। साल भर में भेंट चढ़ावा बीस हज़ार रुपये के लगभग मूल्य का आता है। निधियों में लगाए गए धन से ग्यारह हज़ार आठ सौ रुपये का ब्याज मिलता है।
सन् 1868 में स्वामी ने पूरी जमींदारी एक प्रबंध समिति को हस्तान्तिरित कर दी थी। इसमें दो हज़ार रुपये की टिकटें लगीं थी। स्वामी के बाद श्री निवासाचार्य को नामजद किया गया था, जो अपने पूर्वज की भाँति विद्वान न होकर सामान्य जन की भाँति शिक्षित था। उसके दुराचरण के कारण व्यवस्था करने की आवश्यकता आ पड़ी। उसकी लम्पटता जगजाहिर और कुख्यात थी। उसकी फ़िज़ूलख़र्ची की कोई सीमा नहीं थी। अपने पिता के निधन के बाद वह कुछ गुज़ारा भत्ता पाता रहा। मन्दिर की व्यवस्था-सेवा के लिए मद्रास से दूसरे गुरु लाये गये। जमींदारी पूरी तरह छ: सदस्यों की एक समिति के नियंत्रण में रही। इनमें से सबसे उत्साही सेठ नारायण दास थे। सेठ को न्यासियों का मुख़्तार आम बनाया गया था। मन्दिर की बीस लाख की सम्पत्ति इसी सेठ के नाम कर दी गई। इस सुप्रबन्ध के बाद उत्सव समारोहों के आयोजनों में कोई गिरावट नहीं आने पाई और न दातव्यों की उदारता ही घटी बल्कि दफ़्तर के वैतनिक व्यय में भी कमी हुई। प्राभूत वाले गाँवों में से तीन गाँव महावन में और दो जलेसर में थे।
जयपुर नरेश मानसिंह ने रंगजी मन्दिर को ये दान किये थे। यद्यपि वह राज सिंहासन का वैधानिक उत्तराधिकारी था फिर भी वह उस पर कभी न बैठा। राजा पृथ्वीसिंह की रानी के गर्भ से वह उसके निधनोपरांत पैदा हुआ था। सन् 1779 ई॰ में पृथ्वीसिंह की मृत्यु के बाद उनके भाई प्रताप सिंह ने उत्तराधिकार का दावा किया। दौलतराव सिंधिया ने इससे भतीजे मानसिंह का अधिकार रोक दिया। मानसिंह युवा राजकुमार था और साहित्य और धर्म के प्रति समर्पित था। तीस हज़ार रुपये वार्षिक आय के आश्वासन पर राजा की उपाधि त्यागकर वह वृन्दावन वास करने लगा। उसने कठिन धार्मिक नियमों के पालन में शेष जीवनकाल यहीं व्यतीत किया। सत्तर वर्ष की आयु में सन् 1848 में उसका वहीं निधन हुआ। सत्ताईस वर्ष पर्यंत पालथी मारे एक ही मुद्रा में बैठा रहा। वह अपने आसन से नही उठता था। सप्ताह में बस एक बार ही प्राकृतिक विवशता वश आसन छोड़ता था। पाँच दिन पूर्व ही उसने अपने अन्त की भविष्यवाणी की थी और अपने बूढे सेवकों की देखभाल करने की प्रार्थना सेठ से की थी। उनमें से लक्ष्मी नारायण व्यास नामक एक सेवक सन् 1874 तक अपनी मृत्यु पर्यन्त मन्दिर की जमींदारी का प्रबन्धक बना रहा।

Thursday, October 13, 2011

श्याम सुन्दर मंदिर वृन्दावन की परिक्रमा कर हम लोट रहे थे , अचानक एक रिक्शा वाला आया , 'राधे राधे 'आवाज़ आयी सुनकर हमने रास्ता दिया और वो निकल गया , वृन्दावन मैं रिक्शे वाले इसी प्रकार रास्ता मांगते हैं , और चले जाते हैं , लोंगों को अचानक राधे राधे की आवाज़ सुनकर लगता है की कोई आरहा है , मोबाईल फोन पर बात करने के लिए लोग बात चीत राधे राधे से ही शुरु करते हैं , एसा है वृन्दाबन , 

Sunday, August 21, 2011

जन्माष्टमी,भगवान श्री कृष्ण का जन्म दिवस

जय श्री राधे 
                 कल जन्माष्टमी है , भगवान श्री कृष्ण का जन्म दिवस , सर्व प्रथम सभी पाठकों को लल्ला के जन्म दिन की बधाई ! बृज मैं इस दिन घर घर मैं कान्हा का जन्म दिन मनाया जाता है ,इस बृज के हर घर मैं कान्हा जन्म लेंगे ,मुख्य कार्यक्रम श्री कृष्णजन्म स्थान , मथुरा पर होता है ,हर मंदिर में इस दिन लल्ला के जन्म का उत्सव मनाया जाता है , अगले दिन गोकुल में नन्द बाबा के घर कृष्ण के पहुँचने का उत्सव "नंदोत्सव" मनाया जाता है , इस दिन मिठाई, खिलोने,सिक्के आदि खूब लुटाये जाते हैं ,मुंबई में गोविंदा 'मटकी फोड़ ' नंदोत्सव का 
 ही रूप है , इस दिन वृन्दावन में रंग जी के मंदिर में लठ्ठे का मेला होता है जो नंदोत्सव ही है 
                   आगे फिर कभी 
                                                                                                           श्री राधे


Thursday, July 28, 2011

राधे राधे 
             वृन्दाबन धाम मैं सावन का महीना आनंद का है ! चारों ओर भगवान के झूलों की बहार है !हर मंदिर मैं सावन के महीने में हिंडोलों में भगवान के दर्शन का सोभाग्य मिलता है ! बाँके बिहारी जी का झूला साल में एक दिन " हरियाली तीज"  पर ही होता है ! उस दिन बाँकेबिहारी जी उस दिन शाम ४ बजे से रत १२ बजे तक झोले में बिराजते हैं और भक्तों को दर्शन देते हैं 

Friday, July 1, 2011

श्री निधि वन मंदिर

जय श्री राधे 
                आज का विषय रहेगा श्री निधि वन मंदिर ,जो मधुबन का अपभ्रंश है ! यह स्थान भगवान कृष्ण की क्रीडा भूमि है , जहाँ वे राधा रानी के साथ बांसुरी बजा कर नाचा करते थे , साथ मैं गोपियाँ भी नाचा करती थी !आज भी वृन्दाबन जो कंक्रीट का वन बनता जा रहा है , परन्तु श्री निधि वन को सुरख्यित रखा गया है , कहा जाता है यहाँ आज भी रत को भगवान श्री राधा रानी व गोपियों के साथ रासलीला करते हैं , रात मैं मंदिर मैं कोई नहीं रहता है , पुजारी भी मंदिर बंद करके परिसर से बाहर चलेजाते हैं 
                                                                                               जय श्री राधे  

Shri Nidhivan Raj

जय श्री राधे 
                   आज ka 

Thursday, June 23, 2011

वृन्दाबन के बारे मैं जानकारी के लिए पड़ते रहें , मेरा ये ब्लाग  "वृन्दाबनधाम .ब्लाग स्पोट .कॉम "

सेवा कुञ्ज ,कृष्ण द्वारा राधा रानी की चरण सेवा

 जय श्री राधे 
                   अनेक दिनों से राजनीत की ,बहस  मैं उलझ गया , जिस से मूल उद्देश्य से भटक गया ! पुनः अपनी बात पर आते है ! 
                     आज का मंदिर है श्री सेवा कुञ्ज , जहाँ भगवान श्री कृष्ण ने श्री राधा रानी की चरण सेवा की थी !जब महारास के बाद श्री राधा रानी जी थक गयी तो सेवा कुञ्ज की छावं मैं बैठ गयी , परन्तु उनके थकन नहीं गयी , सब लोग अपने घरों को जाने लगे , तो भगवान ने कहा कि आप भी चलो , र्धरानी ने कहा कि मैं बहुत थक गयी हूँ , अब नहीं चल सकती ,और इतना कह कर नेत्र बंद कर लिए , तो भगवान ने श्री राधा रानी के  चरण दबाना प्रारंभ कर दिया , राधा जी इतनी थक गयी कि नेत्र खोल कर देखे बिना नींद मैं चली गयी , चरण दबाने से आराम मिला तो नीद और गहरी हो गयी , कृष्ण  जी चरण दबाते रहे और भोर हो गयी ! अचानक राधा रानी कि नींद खुली ,चरण दबाते देख पूछ लिया , आप क्या कर रहे हो , आप थक गयी थी न इस लिए चरण दबा रहा हूँ 
               आज भी सेवा कुञ्ज मैं राधा के चरण सेवा के दर्शन हैं 
        लोग इस लीला को सुन कर असहज हो जाते हैं , उन्हें ज्ञान नहीं है कि राधा , प्रभु की परम शक्ति हैं , न कि साधारण स्त्री , इसे समझाने के लिए मेरे पास शब्द नहीं , गुरूदेव कि कृपा से फिर कभी समझाऊंगा 
                                                                               जय श्री राधे 

Thursday, June 9, 2011

श्री राधे 
          पिछले कई महीने से कुछ लिखा नहीं ,ऐसा निजी कारणों से रहा ,
   पिछले हफ्ते बाबा रामदेव के अनशन पर केंद्र सरकार के कहर से दुःख पहुंचा , कि एक ऐसा आदमी जो किसी के साथ हिंसा कि बात नहीं कर रहा उस पर इस कदर डंडे का जोर दिखाना कहाँ कि बहादुरी है , ४ जून कि रात को हुए  घटना क्रम को सही नहीं ठहराया जा सकता ,बाबा का तरीका गलत हो सकता है बार बात सही है ,जितना धन विदेश में काले धन के रूप में जमा है उसे वापस लाया जाये तो देश पर जितना क़र्ज़ है वो चुकाया जा सकता है ,समाजवादी पार्टी के हाल के आगरा मे हुए  सम्मलेन मे सपा मुखिया ने भी इन बातों को उठाया था ,पर हाय  री राजनीती ,मुलायम सिंह सरकार को समर्थन कर रहे हैं ,बाबा नेताओं को चोर , बेईमान कहते है इस लिए बाबा पर डंडे बरसाए ,निर्दोष जनता को पीटा,ओरतों,बच्चों पर भी अत्याचार किया यह गलत ,अन्याय है ,कांगरेश के महा सचिव दिग्विजय सिंह ओसामा को जी   कह कर सम्भोदित करते है ,बाबा रामदेव को ठग कहते हैं , उन्हें शर्म आणि चाहिए ,में इस घटना कि निंदा करता हूँ ,आप सभी से प्राथना करता हूँ कि आप भी आपनी और से निंदा करें जिससे इन बेईमानों को लगे कि कितने लोग इन की करतूतों के विरोध में हैं