Monday, March 21, 2022
रँगजी मन्दिर के ब्रह्मोत्सव (रथ के मेले) के अंतर्गत दूसरे दिन प्रातः काल स्वर्ण सूर्य प्रभा पर तथा सायं रजत हंस पर विराजमान होकर भगवान बगीचे में बिहार करने जाते हैं
Sunday, March 20, 2022
रँगनाथ जी मन्दिर का ब्रह्मोत्सव
Sunday, March 13, 2022
ब्रह्मांड घाट गोकुल महावन
सवामन शालिग्राम
Monday, February 21, 2022
गोरे दाऊजी मन्दिर, परिक्रमा मार्ग वृन्दावन
Friday, February 18, 2022
कारे दाऊजी, अनाज मंडी ,वृन्दावन
Tuesday, February 15, 2022
जुगल किशोर मन्दिर, केशीघाट वृन्दावन
कुसुम सरोवर, गोवर्धन पर्वत, मथुरा
बृज दर्शन,ग्वालियर मन्दिर, वृन्दावन
ब्रज चौरासी कोस मंदिर शृंखला
मंदिर ग्वालियर "ब्रह्मचारी का" प्राचीन
इस मंदिर का निर्माणकाल सन् 1860 है।गोपेश्वर महादेव के निकट महाराजा जीवाजी राव सिंधिया के पिता ने बनवाया पत्नी राजमाता विजया राजे सिंधिया तथा माधवराव सिंधिया के पिता थे ग्वालियर वालों के द्वारा बनवाया गया मंदिर में मुख्यत: ठाकुर राधागोपाल, हंस गोपाल एवं नृत्यगोपाल विराजित हैं मंदिर में पाँचों निम्बार्काचार्यों की मूर्तियाँ श्री हंस,सनक,नारद,एवं श्री निवास के रूप में दर्शन होते हैं।
राजा सिंधिया के गुरु श्री गिरधारी ब्रह्मचारी जी का मंदिर भी कहते हैं।मंदिर को बनवाकर जीवाजी ने अपने गुरू को अर्पण कर दिया था प्राचीन पच्चीकारी पत्थरों में कलात्मक ढंग की ऊँची सीढ़ियाँ देखने लायक हैं।
गिरधारी शरण जी को वाक्य सिद्धी थी बाद में गुरूजी ने रुष्ट होकर मंदिर छोड़ दिया बाद में छटीकरा के रास्ते गोपालगढ़ में अपने शिष्यों के साथ रहने लगे।
गिरधारी शरण देव का जन्म सन्1941 में सवाई माधोपुर के पास लसोड़ा ग्राम में हुआ था पिता महोवत राम सनाढ्य ब्राह्मण थे।
घर में बैलगाड़ियों से व्यापार होता था एक दिन बैलगाड़ी से जा रहे थे रास्ते में सिंह ने आक्रमण कर बैल को मार दिया इन पर कायरता का आरोप मढ़ते हुए भाभी ने डूब मरने को कहा।झोझा नामक झील में आत्महत्या करने के लिए डूबे लोगों ने बचा लिया।झील में सालिग्राम की एक मूर्ति मिली उसे ही लेकर वृन्दावन आ गये गुरू आदेश से तपस्या की तो वाक्यसिद्धि हो गयी उसी का चमत्कार जीवाजी ने देखा तो मंदिर इनको बनवाकर दिया।
Sunday, September 12, 2021
बल्देव छट
ब्रज के राजा श्री दाऊ जी महाराज के जन्मोत्सव की बधाई
मथुरा के बलदेव में भगवान श्रीकृष्ण के अग्रज एवं ब्रज के राजा बलदेव दाऊजी का जन्मोत्सव मनाया जाएगा। सुबह चार बजे विशेष अभिषेक और हीरा जवाहरात के साथ श्री दाऊजी महाराज विशेष शृंगार किया जाएगा। लेकिन कोरोना संक्रमण के कारण इस बार श्रद्धालु मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकेंगे।
भगवान के कृष्ण अवतार में यदुवंश में बलदेव जी प्रकट हुए। गर्ग संहिता में देवकी के सातवें गर्भ में बलदेव जी का आगमन हुआ। वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी कंस के भय से गोकुल में रहती थी। योग माया ने गर्भ को देवकी के उदर से रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया था।
देवकी का सातवां गर्भ हर्ष और शोक वाला था। पांच दिन बाद भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि स्वाति नक्षत्र बुधवार थी, मध्याह्न के समय, तुला लग्न में पांच ग्रह उच्च थे, रोहिणी के गर्भ से नंद भवन में श्री बलदेव जी अवतरित हुए।
भूमि खोदकर निकाला गया था विग्रह
बलराम जी की विशाल मूर्ति श्रीकृष्ण के पौत्र श्री बज्रनाभ ने पूर्वजों की स्मृति में स्थापित कराई थी। यह मूर्ति द्वापर के बाद भूमिस्थ हो गई थी। मूर्ति पूर्व कुषाण कालीन है। गोकुल में श्रीमद् बल्लभाचार्य पौत्र गोस्वामी गोकुलनाथ जी को बलदेव जी ने स्वप्न दिया कि श्यामा गाय जिस स्थान पर दूध स्रवित करती है, उस भूमि में प्रतिमा है।
भूमि की खोदाई कर विग्रह निकाला। श्री कल्याण देव जी को पूजा-अर्चना का भार सौंपा। तभी से श्री कल्याण देव जी के वंशज पूजा सेवा करते हैं। बलदेव जी का श्री विग्रह आठ फीट ऊंचा, साढ़े तीन फीट चौड़ा श्याम वर्ण है, पीछे शेष नाग सात फनों से युक्त छाया करते हैं। विग्रह नृत्य मुद्रा में है, दाहिना हाथ सिर से ऊपर वरद मुद्रा में है। बायें हाथ में चषक है।
Monday, January 27, 2020
मदन मोहन जी मन्दिर वृन्दावन
में मुल्तान निवासी रामदास कपूर ने निर्माण कराया।आजकल यह पुरातत्व विभाग के अधीन है।
चैतन्य महाप्रभु के छै प्रमुख शिष्यों में से सनातन गोस्वामी की सेवा में यह मंदिर बना।सन्1670 में इसे औरंगजेब के द्वारा तोड़ा गया।बाद में पुनर्निर्माण राजा गुणानंद ने कराया।
कहानी बड़ी रोचक है कृष्ण का काल लगभग 5000 साल का है।उनके बाद उनके प्रपौत्र बज्रनाभ ने ब्रज की धरोहरों को सुरक्षित किया।
लेकिन बाद में मुस्लिम आक्रान्ताओं ने तहस नहस कर दिया।उसी दौरान की यह मूर्ति जमीन में अद्वैत टीले के नीचे दबी पड़ी थी।स्वप्न हुआ तो इसे फिर स्थापित किया गया।
उस समय नावों से व्यापार चलता था बताते हैं रामदास कपूर की नाव यमुना में फँस गई जिसे भगवान के रूप में किसी बालक ने धक्का देकर निकाल दिया खुश होकर सेठ ने यह मंदिर बनबाया बाद में अकबर ने काफी जमीन ठाकुर के अस्तित्व में कर दी।फिर अन्य बादशाहों ने आतंक किया तो मूर्ति करौली में मदनमोहन जी के रूप में स्थापित कर दी।
इस मंदिर पर एक स्वर्ण कलश था राजा गुणानंद को मदनमोहन की सुरक्षा पर गर्व था। माँट गाँव का एक चोर था जिसने कलश उतारकर ले जाने की चेतावनी दी नीचे यमुना बहती थी।वह एक एक कील घंटे की चोट पर गाड़ता गया तथा कलश को लेकर यमुना में कूद गया।बाद में राजा ने उसे इनाम भी दिया।
Wednesday, December 11, 2019
56 भोग क्यों और क्या
हिन्दू लोग भगवान को छप्पन भोग का प्रसाद चढ़ाते हैं
भगवान श्रीकृष्ण को 56 प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं जिसे 56 भोग कहा जाता है
कथा के अनुसार माता यशोदा बालकृष्ण को एक दिन में अष्ट पहर भोजन कराती थी अर्थात बालकृष्ण 8 बार भोजन करते थे
एक बार जब इन्द्र के प्रकोप से सारे व्रज को बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाया था, तब लगातार 7 दिन तक भगवान ने अन्न-जल ग्रहण नहीं किया
8वें दिन जब भगवान ने देखा कि अब इन्द्र की वर्षा बंद हो गई है, तब सभी ब्रजवासियों को गोवर्धन पर्वत से बाहर निकल जाने को कहा
तब दिन में 8 पहर भोजन करने वाले बालकृष्ण को लगातार 7 दिन तक भूखा रहना उनके ब्रजवासियों और मैया यशोदा के लिए बड़ा कष्टप्रद हुआ
तब भगवान के प्रति अपनी अनन्य श्रद्धाभक्ति दिखाते हुए सभी ब्रजवासियों सहित यशोदा माता ने 7 दिन और अष्ट पहर के हिसाब से 7X8=56 व्यंजनों का भोग बालगोपाल को लगाया
श्रीमद्भागवत कथा के अनुसार जब कृष्ण की गोपिकाओं ने उनको पति रूप में पाने के लिए 1 माह तक यमुना में भोर में ही न केवल स्नान किया, अपितु कात्यायिनी मां की पूजा-अर्चना की ताकि उनकी यह मनोकामना पूर्ण हो
जब श्रीकृष्ण ने उनकी मनोकामना पूर्ति की सहमति दे दी तब गोपिकाओं ने 56 भोग का आयोजन करके भगवान श्रीकृष्ण को भेंट किया
एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण राधिकाजी के साथ एक दिव्य कमल पर विराजते हैं उस कमल की कुल पंखुड़ियों की संख्या 56 होती है अत: 56 भोग से भगवान श्रीकृष्ण अपनी सखियों संग तृप्त होते हैं
इनमे निम्नलिखित भोग आते हैं
> रसगुल्ला
> चन्द्रकला
> रबड़ी
> शूली
> दधी
> भात
> दाल
> चटनी
> कढ़ी
> साग-कढ़ी
> मठरी
> बड़ा
> कोणिका
> पूरी
> खजरा
> शरबत
> वाटी
> सिखरिणी
> मुरब्बा
> मधुर
> कषाय
> तिक्त
> कटु पदार्थ
> अम्ल {खट्टा पदार्थ}
> शक्करपारा
> घेवर
> चिला
> मालपुआ
> जलेबी
> मेसूब
> पापड़
> सीरा
> मोहनथाल
> लौंगपूरी
> खुरमा
> गेहूं दलिया
> पारिखा
> सौंफ़लघा
> लड़्ड़ू
> दुधीरुप
> खीर
> घी
> मक्खन
> मलाई
> शाक
> शहद
> मोहनभोग
> अचार
> सूबत
> मंड़का
> फल
> लस्सी
> मठ्ठा
> पान
> सुपारी
> इलायची
Monday, August 26, 2019
श्री राधारमण हरि बोल
वृन्दावन के इस प्राचीन विग्रह के स्वयं प्राकटय होने के बारे में गोस्वामी ने बताया कि दक्षिण में कावेरी के तट पर श्रीरंगम का विशाल मंदिर है। मंदिर के महंत महान विद्वान अर्चक वेंकट भट्ट थे। चैतन्य महाप्रभु ने अपनी दक्षिण यात्रा के समय वेंकट भट्ट के यहां ही जब चातुर्मास किया था तो वेंकट भट्ट के पुत्र गोपाल भट्ट ने उनके इस प्रकल्प में बहुत अधिक सहयोग किया था।
चार माह बीतने के बाद जब चैतन्य महाप्रभु चलने लगे तो गोपाल भट्ट भी उनके साथ जाने को तैयार हो गए। इस पर चैतन्य महाप्रभु ने वेंकट भट्ट को आज्ञा दी कि वे गोपाल भट्ट की शिक्षा दीक्षा पूरी कराकर उन्हें वृन्दावन भेज दें। उन्होंने उनसे यह भी कहा था कि गोपाल भट्ट को वे एक बार नेपाल में गंडकी नदी में स्नान के लिए अवश्य भेजें क्योंकि वहां पर इन्हें प्रभु का अभूतपूर्व आशीर्वाद मिलेगा।
नेपाल की गंडकी नदी से मिले थे 12 शालिग्राम
आचार्य दिनेश चन्द्र गोस्वामी ने बताया कि अपनी शिक्षा दीक्षा पूरी करके अपने माता पिता की आज्ञा लेकर गोपाल भट्ट तीर्थाटन के लिए चल पड़े। भक्ति सिंद्धांत का प्रचार करते करते वह नेपाल पहुंचे। वहां पर गण्डकी नदी में स्नान करने के दौरान एक ऎसी घटना घटी जो प्रत्येक भगवत भक्त को कलियुग में सतयुग का आभास कराती है। नदी में डुबकी लगाते समय उनके उत्तरेय में 12 शालिग्राम आ गए तो गोपाल भट्ट ने उन्हें जल में विसर्जित कर दिया किंतु उन्होंने जैसे ही दुबारा डुबकी लगाई उनके उत्तरीय में न केवल 12 शालिग्राम फिर से आ गए बल्कि उन्हें एक आवाज भी सुनाई पड़ी जिसमें कहा गया था कि वह उन्हे वृन्दावन धाम ले जाएं और वहीं पर उनकी आराधना करें। इसके बाद गोपाल भट्ट इसे भगवत आज्ञा मानकर वृन्दावन ले आए तथा इसी शालिग्राम से शोडशागुल परिमाण नवनीत नीरद श्याम विग्रह अर्थात श्री राधारमण महाराज का दिव्य विग्रह प्रकट हुआ
वृन्दावन के इस प्रसिद्ध मन्दिर में श्री गोपाल भक्त गोस्वामी जी के उपास्य ठाकुर हैं। यहाँ श्री राधारमण जी, ललित त्रिभंगी मूर्ति के दर्शन हैं। 1599 विक्रम संवत वैशाख शुक्ला पूर्णिमा की बेला में शालिगराम से श्री गोपालभट्ट प्रेम वशीभूत हो ब्रज निधि श्री राधारमण विग्रह के रूप में अवतरित हुए।
एक बार एक व्यक्ति ने गेंदे के पुष्पों से चारों तरफ से सजे बीच में विराजमान शालिगराम भगवान को देखकर गोस्वामी जी ने व्यंग करते हुए कहा कि तुम्हारे शालिगराम तो ऐसे लग रहे है जैसे कढ़ी में बैंगन पड़ा हो
यह सुनकर भक्त गोस्वामी जी के मन में यह प्रबल अभिलाषा हुई कि यदि शालग्राम ठाकुर जी के हस्त-पद होते तो मैं उनकी विविध प्रकार से अलंकृत कर सेवा करता, उन्हीं झूले पर झुलाता। भक्तवत्सल प्रभु अपने भक्त की मनोकामना पूर्ण करने के लिए उसी रात में ही ललितत्रिभंग श्री राधारमण रूप में परिवर्तित हो गये। भक्त की इच्छा पूर्ण हुई। भट्ट गोस्वामी ने नानाविध अलंकारों से भूषितकर उन्हें झूले में झुलाया तथा बड़े लाड़-प्यार से उन्हें भोगराग अर्पित किया।
श्रीराधारमण विग्रह की पीठ शालग्राम शिला जैसी दीखती है। अर्थात पीछे से दर्शन करने में शालग्राम शिला जैसे ही लगते हैं।
द्वादश अंगुल का श्रीविग्रह होने पर भी बड़ा ही मनोहर दर्शन है।
श्रीराधारमण विग्रह का श्री मुखारविन्द गोविन्द जी के समान, वक्षस्थल श्री गोपीनाथ के समान तथा चरणकमल मदनमोहन जी के समान हैं। इनके दर्शनों से तीनों विग्रहों के दर्शन का फल प्राप्त होता है।
सेवाप्राकट्य ग्रन्थ के अनुसार सम्वत 1599 में शालग्राम शिला से राधारमण जी प्रकट हुए।
उसी वर्ष वैशाख की पूर्णिमा तिथि में उनका अभिषेक हुआ था।
राधारमणजी के साथ श्रीराधाजी का विग्रह नहीं है। परन्तु उनके वाम भाग में सिंहासन पर गोमती चक्र की पूजा होती है।
श्रीहरिभक्तिविलास में गोमतीचक्र के साथ ही शालग्राम शिला के पूजन की विधि दी गई है।
श्रीराधारमण मन्दिर के पास ही दक्षिण में श्रीगोपालभट्टगोस्वामी की समाधि तथा राधारमण के प्रकट होने का स्थान दर्शनीय है।
अन्य विग्रहों की भाँति श्री राधारमण जी वृन्दावन से कहीं बाहर नहीं गये।
🙏🌹 राधे राधे 🙏🌹














