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Tuesday, September 27, 2022

टेसू , झांझी उत्तर भारत की परंपरा

 उत्तर भारत में एक प्राचीन परंपरा टेसू और झाझी की है धीरे धीरे आधुनिकता में नगरों में यह लुप्त हो रही है परन्तु जैसा सभी जानते है भारत व उसकी परंपराओं की जड़ गांवों में है। जिसका वर्णन शास्त्रों में मिलता है ।

ब्रजलोक में विशेष रूप से प्रचलित है। लड़के टेसू, जो मनुष्य की आकृति का खिलौना होता है, लेकर द्वार-द्वार पर घूमते हैं, टेसू के गीत गाते है और पैसे माँगते हैं। विषय की दृष्टि से यह गीत बहुत ही ऊटपटाँग और अद्भुत कहे जा सकते हैं, किन्तु ये बड़े मनोरंजक होते हैं। टेसू को जनश्रुति एक प्राचीन वीर के रूप में स्मरण करती है। जिसका वर्णन
खाटू श्यामजी महाभारत के बर्बरीक के रूप हैं, जिन्हें भगवान श्री कृष्ण ने खाटू श्याम नाम दिया। मान्यता है कि श्रीकृष्ण कलयुगी अवतार के रूप में खाटू श्यामजी खाटू में विराजित हैं। इन्हें कलयुग के अवतार, श्याम सरकार, तीन बाणधारी, खाटू नरेश व अन्य नामों से भी पुकारा जाता है। 

पूर्णिमा के दिन टेसू तथा झाँझी का विवाह भी रचाया जाता है। सांझी और टेसू के खेल अधिकांश उत्तर भारत में लोकप्रिय है। टेसू की अपनी ही छटा है। टेसू का खेल उत्तर भारत और आसपास के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खेला जाता है, यहां इसे बालक ही नहीं युवा भी खेलते हैं। सांझी बनाते समय बालिकायें जो गीत गाती हैं वे तो पूरे के पूरे प्रादेशिक भाषा के होते हैं।

आमतौर पर टेसू का स्टैण्ड बांस का बनाया जाता है जो तीन बाणों का रूप है तथा जिसमें मिट्टी की तीन पुतलियां फिट कर दी जाती हैं। जो क्रमश: टेसू राजा, दासी और चौकीदार की होती है या टेसू राजा और दो दासियां होती हैं। मध्य में मोमबत्ती या दिया रखने का स्थान होता है।
टेसू जो कि का खाटू श्याम जी का रूपांतरण है, श्याम बाबा की कहानी महाभारत से शुरू होती है। वे पहले बर्बरीक के नाम से जाने जाते थे। वे महान पांडव भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र हैं। बाल्यकाल से ही वे वीर और महान योद्धा थे। उन्होंने युद्ध कला अपनी मां से सीखी। इसके अलावा उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और तीन अभेध्य बाण प्राप्त किए और तीन बाणधारी का प्रसिद्ध नाम प्राप्त किया। वहीं अग्नि देव ने प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया, जो कि उन्हें तीनों लोकों में विजयी बनाने में समर्थ थे। 

महाभारत के युद्ध में मां की आज्ञा लेकर बर्बरीक युद्ध में अर्जुन का साथ देने जा रहे थे तभी मां ने उनसे कहा की तुम उसकी तरफ से युद्ध करोगे जो हार रहा होगा। इधर, भगवान श्री कृष्ण सब कुछ जान लिया और उन्होंने ब्राह्मण के रूप में उनकी परीक्षा ली उनसे पूछा की तुम्हें तीन बाण प्राप्त हुए हैं और तुम अर्जुन की तरह से लड़ोगे तो कौरव खत्म हो जाएगा और फिर वचन अनुसार कौरव की तरह से लड़ोगे तो ये खत्म हो जाएंगे। इस पर बर्बरीक ने उपाय पूछा कि तो फिर हमें क्या करना चाहिए। कृष्ण ने उनका सिर मांग लिया इस पर उन्होंने अपना सिर भगवान कृष्ण को दे दिया। कृष्ण ने ऐसे बलिदान से प्रसन्न होकर वरदान दिया कि कलियुग में तुम श्याम के नाम से जाने जाओगे, क्योंकि कलयुग में हारे गए का साथ देने वाला एक ही श्याम नाम धारण करने वाला समर्थ है और खाटू नगर तुम्हारा धाम बनेगा। तुम्हारे सिर को खाटू में दफनाया जाएगा। वहीं तुम्हरी मां के वचन अनुसार जो भक्त हार गया हो तुम उसके सहारा बनोगे।

पारम्परिक टेसू की आँखों और नाक तथा इसके मुख के स्थान पर कौड़ी चिपकाई जाती है। अतः चार कौड़ियों की आवश्यकता होती है। बाद में ये कौड़ियाँ सँभालकर रख ली जाती हैं क्योंकि इनको शुभ और कल्याणकारी माना जाता है।

टेसू रे टेसू घंटार बजाना,
इक नगरी दस गाँव बसाना।

उड़ गए तीतर रह गए मोर,
गबरू बैल को ले गए चोर
चोरों के घर खेती हुई,
खाके  चोरनी मोटी हुई,

मोटी होके मायके आई,
देख हँसे सब लोग लुगाई,

गुस्सा  होके पहुँची दिल्ली,
दिल्ली से लाई दो बिल्ली,
एक बिल्ली कानी,
सब बच्चों की नानी,

नानी नानी टेसू आया,
संग में अपने झाँझी लाया,

मेरा टेसू यहीं अड़ा,
खाने को माँगे दही बड़ा,

दही बड़ा हो हइया, झट निकाल रुपइया,
रुपए के तो ला अखरोट,
मुझको दे दे सौ का नोट।

मेरा टेसू यहीं खड़ा
मेरा दही बड़ा टेसू यहीं अड़ा,
खाने को माँगे दही बड़ा,

दही बड़ा बहुतेरा,
खाने को मुँह टेढ़ा। 

मथुरा को जाएँगे, चार कौड़ी लाएँगे

कौड़ी अच्छी हुई तो, टेसू में लगाएँगे,
टेसू अच्छा हुआ तो, गाँव में घुमाएँगे,
गाँव अच्छा हुआ तो, चक्की लगबाएँगे,
चक्की अच्छी हुई तो, आटा पिसवाएँगे,
आटा अच्छा हुआ तो, पूए बनवाएँगे,

पूए अच्छे हुए तो, गपगप खा जाएँगे,

खाकर अच्छा लगा तो बाग घूमने जाएँगे,

बाग अच्छा हुआ तो, माली को बुलाएँगे,

माली अच्छा हुआ तो, आम तुड़वाएँगे,

आम अच्छे हुए तो, घर भिजवाएँगे,

 घर भिजवाकर, अमरस बनवाएँगे,

 अमरस अच्छा हुआ तो, मथुरा ले जाएँगे।

कुसुम सरोवर, गोवर्धन पर्वत, मथुरा

ब्रज चौरासी कोस मंदिर दर्शन श्रंखला 

#कुसुम_सरोवर

यह राधाकुंड से तीन किमी० दूर गोवर्धन परिक्रमा
मार्ग में स्थित है।यहाँ पर किशोरी जी फूलमाला बनाकर स्यामसुंदर को पहनाती हैं।कुंड का नव निर्माण सीढ़ियाँ सन् 1767 में भरतपुर के प्रतापी राजा जवाहर सिंह ने कराया।घाट के पश्चिम दिशा में सूरजमल की छतरी है।दाऊजी का मंदिर और उत्तर दिशा में सूरजमल की छतरी है।उत्तर पश्चिम कोण पर उद्धव जी की बैठक है,पास में नारदकुंड तथा पास में ग्वालियर के राजा का मंदिर बना है।

गोवर्धनाद्दूरेण वृन्दारण्ये सखी स्थले।
प्रवत्त: कुसुमाम्भोषो कृष्ण संकीर्तनोत्सव:।।
(भागवत १०/२/३०)

कुसुम सरोवर ही बज्रनाभ व उनकी माँ ऊषा ने श्री मद्भागवत कथा का श्रवण किया।जो शुकदेव मुनि ने सुनाई।जो उद्धव जी ने परीक्षित को आदेशित किया।


Thursday, May 12, 2022

मोहिनी एकादशी

कल मोहिनी एकादशी थी, कहा जाता है कि मोहिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु ने सागर मंथन में निकले अमृत के लिए लड़ते हुए देवता और दैत्यों के बीच मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को अमृत कलश से अमृत पिलाया था, भगवान का मोहिनी रूप इतना सुन्दर था कि भगवान शंकर जी भी उन पर मोहित हो गए थे

Monday, March 21, 2022

रँगजी मन्दिर के ब्रह्मोत्सव (रथ के मेले) के अंतर्गत दूसरे दिन प्रातः काल स्वर्ण सूर्य प्रभा पर तथा सायं रजत हंस पर विराजमान होकर भगवान बगीचे में बिहार करने जाते हैं

रँगजी मन्दिर के ब्रह्मोत्सव (रथ के मेले) के अंतर्गत दूसरे दिन प्रातः काल स्वर्ण सूर्य प्रभा पर तथा सायं रजत हंस पर विराजमान होकर भगवान बगीचे में बिहार करने जाते हैं,
बगीचे में ठाकुर जी विश्राम करते हैं, भोग लगाया जाता है, सवारी पुनः भक्तों को दर्शन देते हुए मन्दिर में लौट जाती है

Sunday, March 20, 2022

रँगनाथ जी मन्दिर का ब्रह्मोत्सव

उत्तर भारत के सबसे बड़े मन्दिरों में सम्मिलित रँगनाथ जी का मन्दिर वृन्दावन धाम की नाक ऊँची करता है ,चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया से प्रारंभ होने वाला ब्रह्मोत्सव जिसे स्थानीय लोग रथ का मेला भी कहते हैं
प्रथम दिवस भगवान प्रातः सोने की पूर्ण कोठी में विराजमान होकर दर्शन देते हुए मन्दिर के बगीचा तक जाते हैं
सायं काल स्वर्ण सिंह पर सवार होकर बगीचा जाती है

Sunday, March 13, 2022

ब्रह्मांड घाट गोकुल महावन

ब्रज चौरासी कोस मंदिर दर्शन 71.

#ब्रह्मांड_घाट

यमुना पार महावन रमन रेती में जब भगवान कृष्ण ने मुख में मिट्टी खाई तो यशोदा माता सहज भाव से उनके मुख से मिट्टी निकालने लगीं जब मुख खोला तो देखकर दंग रह गयी पूरा ब्रह्मांड दिखाई दिया माँ डर गयी यह वही साक्षात स्थान है जो हमारे धर्मग्रंथों में वर्णित है।

यह विशेषता है इन स्थानों पर आज भी ब्रज में देखने पर हृदय को ऐसा आनंद प्राप्त होता है।ऐसी अनुभूति होने लगती है।ये कल्पना नहीं यथार्थ है।कुछ चित्र संलग्न हैं।

सवामन शालिग्राम

ब्रज चौरासी कोस मंदिर दर्शन श्रंखला 54

मंदिर सवामन शालिग्राम (प्राचीन)

यह मंदिर सन् 1770 में बना हुआ है।रामानुज सम्प्रदाय का यह मंदिर रीवा रियासत के राजा रघुराजसिंह के वंशजों ने बनवाया।ऐसे शालिग्राम विश्वभर में नहीं हैं।रीवा स्टेट के राजा के यहाँ इनकी सेवा होती थी।नैपाल मुक्तिनाथ से कभी रीवा आए थे।ठाकुर प्रेरणा से वृन्दावन मंदिर निर्माण की आज्ञा हुई।श्याम सुंदर मंदिर के सामने लोईबाजार में दिव्य मंदिर का निर्माण हुआ।

प्रथम सेवायत जयराम दास के हाथ में थी सन् 1826 में बालमुकुंद, फिर जनार्दन दास उसके बाद हरिप्रपन्नाचार्य तथा इनकी स्थापना बंगलौर के किसी भक्त द्वारा सवामन सोना तुलादान करके की गयी।वर्तमान में श्री राम आचार्य के आधिपत्य में है।

मंदिर के नीचे लोई बाजार में चौदह दुकानें मंदिर की हैं।जिनसे ठाकुरजी के भोगराग का खर्चा चलता है।

Monday, February 21, 2022

गोरे दाऊजी मन्दिर, परिक्रमा मार्ग वृन्दावन

ब्रज चौरासी कोस मंदिर दर्शन 

गोरे दाऊजी मंदिर 

यह ऐतिहासिक मंदिर श्री गोरे दाऊजी महाराज का
राजपुर ग्राम में स्थित सन् 1763 में "जीवाजी राव सिंधिया" राजा द्वारा बनवाया गया था वृन्दावन परिक्रमा में ऊँचे से चबूतरे पर एक बाबा हाथी रखते थे उनका नाम हाथी वाले बाबा कहते थे।
बाद में यह मंदिर अटल बिहारी ठाकुर परिक्रमा मार्ग में पहुँच गया 1950 से 1970 तक हाथी बाबा यहीं रहे।
यह रामानंदी साधु थे उनके पश्चात वैष्णवदास सेवानिष्ठ हुए।भक्तमाल के वक्ता सिद्ध महात्मा बाबा मथुरादास जी यहाँ विराजे।यहाँ सौ दो सौ साधु नित्य बने रहते हैं।यहाँ साधु सेवा निरंतर रहती है।
दाऊजी गोरे रंग की प्रतिमा है इसीलिए यह स्थान गोरे दाऊजी के नाम से प्रसिद्ध है।

Friday, February 18, 2022

कारे दाऊजी, अनाज मंडी ,वृन्दावन

ब्रज चौरासी कोस मंदिर दर्शन श्रंखला 56.

#मंदिर_कारे_दाऊजी

अनाजमंडी वृन्दावन में लगभग 500 वर्ष पुराना दाऊजी का मंदिर रेवती जी के साथ विराजित है।
जिस समय गोविंद देव प्रकट हुए राजा मानसिंह ने मंदिर निर्माण कराया।उससे भी पहिले का यह मंदिर है।मंदिर के दक्षिण में लालबिहारा नाम से जगह है।वहाँ एक तालाब था उसी में औरंगजेब के आक्रमण के समय दाऊजी को छिपाया गया था।औरंगजेब के बाद तालाब से निकालकर गोस्वामी मुरलीधर के पूर्वजों ने सेवा सँभाली।

मुरलीधर के बड़े भाई बिहारीलाल दोनों सेवा करते थे।पीछे मुरलीधर ब्रजेश के पुत्र घासीराम उनके दो पुत्र राधाचरन व हरचरन थे आजकल हरचरन जी के पुत्र विष्णु सेवायत हैं करौली महारानी ने 150 वर्ष पूर्व इनको दान कर दिया।

Tuesday, February 15, 2022

वृन्दावन के ठाकुर

श्री धाम में ठाकुरजी के श्री विग्रह के सम्बंधित जानकारी,

जुगल किशोर मन्दिर, केशीघाट वृन्दावन

ब्रज चौरासी कोस मंदिर दर्शन श्रंखला 

मंदिर युगल किशोर (प्राचीन)

यह मंदिर केशीघाट वृन्दावन के निकट है सन् 1607 में नोनकरण कछवाहा राजपूत ने बनवाया
यह गोपीनाथ मंदिर के निर्माता रायसेन सेखावत का छोटा भाई था।इसमें राधाकृष्ण युगल विराज मान हैं लाल पत्थरों में ऊँचा शिखर युक्त मंदिर बना है।किन्तु वर्तमान में गुम्बद विहीन है।

आजकल यह पुरातत्व विभाग के संरक्षण में हैमंदिर के द्वारा भाग की शिल्पकारी देखते बनती है।गोवर्धन धारी श्री कृष्ण के साथ ग्वाल बाल लठिया टेके हुए हैं।

ब्रजचौरासी कोस में ऐसे अनेक मंदिर हैं जिनमें काफी धन भी खर्च हुआ पर आज न वहाँ यात्री जाते हैं लेकिन दर्शनीय हैं।मेरा उद्देश्य है उनको प्रकाश में लाना किन्तु काल के प्रभाव से ओझल हो चुके हैं।जहाँ सिद्ध संतों का वास रहा है जो ब्रज से प्रभावित होकर यहाँ बसे थे।

कुसुम सरोवर, गोवर्धन पर्वत, मथुरा

ब्रज चौरासी कोस मंदिर दर्शन श्रंखला 51

#कुसुम_सरोवर

यह राधाकुंड से तीन किमी० दूर गोवर्धन परिक्रमा
मार्ग में स्थित है।यहाँ पर किशोरी जी फूलमाला बनाकर स्यामसुंदर को पहनाती हैं।कुंड का नव निर्माण सीढ़ियाँ सन् 1767 में भरतपुर के प्रतापी राजा जवाहर सिंह ने कराया।घाट के पश्चिम दिशा में सूरजमल की छतरी है।दाऊजी का मंदिर और उत्तर दिशा में सूरजमल की छतरी है।उत्तर पश्चिम कोण पर उद्धव जी की बैठक है,पास में नारदकुंड तथा पास में ग्वालियर के राजा का मंदिर बना है।

गोवर्धनाद्दूरेण वृन्दारण्ये सखी स्थले।
प्रवत्त: कुसुमाम्भोषो कृष्ण संकीर्तनोत्सव:।।
(भागवत १०/२/३०)

कुसुम सरोवर ही बज्रनाभ व उनकी माँ ऊषा ने श्री मद्भागवत कथा का श्रवण किया।जो शुकदेव मुनि ने सुनाई।जो उद्धव जी ने परीक्षित को आदेशित किया।

अशोक अज्ञ

बृज दर्शन,ग्वालियर मन्दिर, वृन्दावन

 ब्रज चौरासी कोस मंदिर शृंखला 


मंदिर ग्वालियर "ब्रह्मचारी का" प्राचीन


इस मंदिर का निर्माणकाल सन् 1860 है।गोपेश्वर महादेव के निकट महाराजा जीवाजी राव सिंधिया के पिता ने बनवाया पत्नी राजमाता विजया राजे सिंधिया तथा माधवराव सिंधिया के पिता थे ग्वालियर वालों के द्वारा बनवाया गया मंदिर में मुख्यत: ठाकुर राधागोपाल, हंस गोपाल एवं नृत्यगोपाल विराजित हैं मंदिर में पाँचों निम्बार्काचार्यों की मूर्तियाँ श्री हंस,सनक,नारद,एवं श्री निवास के रूप में दर्शन होते हैं।


राजा सिंधिया के गुरु श्री गिरधारी ब्रह्मचारी जी का मंदिर भी कहते हैं।मंदिर को बनवाकर जीवाजी ने अपने गुरू को अर्पण कर दिया था प्राचीन पच्चीकारी पत्थरों में कलात्मक ढंग की ऊँची सीढ़ियाँ देखने लायक हैं।


गिरधारी शरण जी को वाक्य सिद्धी थी बाद में गुरूजी ने रुष्ट होकर मंदिर छोड़ दिया बाद में छटीकरा के रास्ते गोपालगढ़ में अपने शिष्यों के साथ रहने लगे।


गिरधारी शरण देव का जन्म सन्1941 में सवाई माधोपुर के पास लसोड़ा ग्राम में हुआ था पिता महोवत राम सनाढ्य ब्राह्मण थे।


घर में बैलगाड़ियों से व्यापार होता था एक दिन बैलगाड़ी से जा रहे थे रास्ते में सिंह ने आक्रमण कर बैल को मार दिया इन पर कायरता का आरोप मढ़ते हुए भाभी ने डूब मरने को कहा।झोझा नामक झील में आत्महत्या करने के लिए डूबे लोगों ने बचा लिया।झील में सालिग्राम की एक मूर्ति मिली उसे ही लेकर वृन्दावन आ गये गुरू आदेश से तपस्या की तो वाक्यसिद्धि हो गयी उसी का चमत्कार जीवाजी ने देखा तो मंदिर इनको बनवाकर दिया।