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Saturday, July 7, 2012

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उपरोक्त लिंक पर वृन्दावन का वो दर्द है जो अनेकों सालों से निवारण की वाट जोह रहा है .........फेस बुक पर मेरी आईडी पर है ....................

Wednesday, July 4, 2012







.................मुड़िया पूर्णिमा..............
.............श्रद्धालुओं का उमड़ा सैलाब
सप्तकोसीय परिक्रमा मार्ग पर नजर आ रहे भक्त ही भक्त
!! परिक्रमा मार्ग में कई चमत्कार होते साक्षात !!
!! पग-पग समेटे है कृष्ण काल की पौराणिकता !!

गोवर्धन। भगवान श्रीकृष्ण की जिन लीलाओं को हमने महाकाव्यों में पढ़ा है, विद्वानों से सुना है, गिरिराज परिक्रमा में उन लीलाओं और उनसे जुड़ी पौराणिक कथाएं आज भी साक्षात होती हैं। ऐसे में इनके दर्शन मात्र से ही कोटि-कोटि पुण्य लाभ अर्जित होता है।
मुड़िया पूर्णिमा पर गिरिराज जी 21 किलोमीटर परिक्रमा करने की मानो होड़ मच जाती है। इस बीच देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु इस अक्षुण्ण पुण्य को हासिल करने के लिए आते हैं। मार्ग में कई पौराणिक स्थल ऐसे है, जो आज भी कृष्णकालीन युग के करीब नजर आते है। बड़ी परिक्रमा की शुरूआत में ही तलहटी में गिरिराज की परिक्रमा से अनूठा अनुभव हासिल होता है। तलहटी में ही लुक-लुक दाऊजी का प्राचीन मंदिर है। बताया जाता है कि यहां श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ लुका-छुपी का खेल खेलते थे।
यहीं पर सिंदूर शिला और काजल शिला भी है। इन शिलाओं के पत्थर घिसने से लाल रंग निकलता है। किवदंति है भगवान श्रीकृष्ण ने इसी शिला से सिंदूर लेकर राधा जी की मांग में भरा था। यहीं काजल शिला भी है, जिससे राधा जी को काजल लगाया था। यहां दर्शन मात्र से ही पुण्य लाभ अर्जित होता है। तलहटी में ही गिरिराज पर्वत के पत्थरों से घर बनाने की पुरानी परंपरा है। बताया जाता है जो श्रद्धालु सच्चे मन से यहां घर बनाकर जाते है तो प्रभु उनके घर का सपना अवश्य पूरा करते है।
पूंछरी के लौंठा पर हाजिरी लगाये बिना परिक्रमा अधूरी मानी जाती है। यहां से जतीपुरा मुखारबिंद होते हुए बड़ी परिक्रमा समाप्त होती है। इसके बाद राधाकुंड परिक्रमा में मानसी गंगा श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहती है। एक बार नंद बाबा ने इंद्र की बजाय गोवर्धन की पूजा शुरू कर दी, अर्चना के श्रीकृष्ण जल मांगा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बांसुरी से गंगा को प्रकट किया। मन से प्रकट होने के चलते इसका नाम मानसी गंगा पड़ा। परिक्रमा में कुसुम सरोवर पूर्व में कुसुम वन होता था। यहां राधा जी सांझी शृंगार के लिये फूल लेने आती थी। यहां पारस पत्थर गिरने के चलते काई नही लगती है।
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      चित्र परिचय  १- मानसी गंगा प्रवेश द्वार २-सप्त  कोसीय परिक्रमा का द्र्ष्य ३-व ४- रेल व बसों से लौटते श्रद्धालु तथा ५-गोवर्धन परिक्रमा में मानसी गंगा पर स्नान का आनंद लेते श्रद्धालु  

तुलसी के अनमोल गुण
* उल्टी होने की दशा में तुलसी का रस इलायची के चूर्ण के साथ देने से लाभ होता है।
* हैजा की स्थिति में तुलसी के पत्तों को काली मिर्च के साथ पीसकर देना चाहिए।
* तुलसी के पत्तों का चूर्ण शहद के साथ देने से सिरदर्द में लाभ होता है।
* कान दर्द में तुलसी का रस बहुत फायदेमंद है। कान में दर्द होने पर तुलसी के पत्तों का रस कान में गुनगुना करके डालें।
* बच्चों के लीवर में गड़बड़ी या अमाशय शूल में तुलसी का रस बहुत लाभप्रद है।
* तुलसी के पत्तों का रस अदरक के रस के साथ समान मात्रा में प्रयोग करने से जुकाम व सिरदर्द में आराम मिलता है।
* छोटा घाव होने पर तुलसी के बीजों को पीसकर बांधने से घाव जल्दी भरता है।
* दांत में यदि कीड़ा लग गया हो तो तुलसी के पत्तों का रस तथा कपूर से भींगी रूई प्रभावित स्थान पर रखने से लाभ होता है।
* शरीर के किसी हिस्से में सूजन आने पर तुलसी के पत्तों के रस का लेप करें।
* खांसी होने पर तुलसी के रस का सेवन करने से कफ बहने लगता है और कफ कम बनता है।

Thursday, April 5, 2012

तुलसी , उसके गुण , जय वृन्दा वन अर्थात तुलसी का वन

तुलसी , उसके गुण , जय वृन्दा वन अर्थात तुलसी का वन 
तुलसी रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा नियंत्रित करने की क्षमता रखती है।

शरीर के वजन को नियंत्रित रखने हेतु भी तुलसी अत्यंत गुणकारी है। इसके नियमित सेवन से भारी व्यक्ति का वजन घटता है एवं पतले व्यक्ति का वजन बढ़ता है यानी तुलसी शरीर का वजन आनुपातिक रूप से नियंत्रित करती है।

तुलसी के रस की कुछ बूँदों में थोड़ा-सा नमक मिलाकर बेहोश व्यक्ति की नाक में डालने से उसे शीघ्र होश आ जाता है।

चाय बनाते समय तुलसी के कुछ पत्ते साथ में उबाल लिए जाएँ तो सर्दी, बुखार एवं मांसपेशियों के दर्द में राहत मिलती है।

10 ग्राम तुलसी के रस को 5 ग्राम शहद के साथ सेवन करने से हिचकी एवं अस्थमा के रोगी को ठीक किया जा सकता है।

तुलसी के काढ़े में थोड़ा-सा सेंधा नमक एवं पीसी सौंठ मिलाकर सेवन करने से कब्ज दूर होती है।

दोपहर भोजन के पश्चात तुलसी की पत्तियाँ चबाने से पाचन शक्ति मजबूत होती है।

10 ग्राम तुलसी के रस के साथ 5 ग्राम शहद एवं 5 ग्राम पिसी कालीमिर्च का सेवन करने से पाचन शक्ति की कमजोरी समाप्त हो जाती है।

दूषित पानी में तुलसी की कुछ ताजी पत्तियाँ डालने से पानी का शुद्धिकरण किया जा सकता है।

रोजाना सुबह पानी के साथ तुलसी की 5 पत्तियाँ निगलने से कई प्रकार की संक्रामक बीमारियों एवं दिमाग की कमजोरी से बचा जा सकता है। इससे स्मरण शक्ति को भी मजबूत किया जा सकता है।

4-5 भुने हुए लौंग के साथ तुलसी की पत्ती चूसने से सभी प्रकार की खाँसी से मुक्ति पाई जा सकती है।

तुलसी के रस में खड़ी शक्‍कर मिलाकर पीने से सीने के दर्द एवं खाँसी से मुक्ति पाई जा सकती है।

तुलसी के रस को शरीर के चर्मरोग प्रभावित अंगों पर मालिश करने से दाग, एक्जिमा एवं अन्य चर्मरोगों से मुक्ति पाई जा सकती है।

तुलसी की पत्तियों को नींबू के रस के साथ पीस कर पेस्ट बनाकर लगाने से एक्जिमा एवं खुजली के रोगों से मुक्ति पाई जा सकती है।

Monday, April 2, 2012

"जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा ".

एक औरत अपने परिवार के सदस्यों के लिए रोजाना भोजन पकाती थी और एक रोटी वह वहां से गुजरने वाले किसी भी भूखे के लिए पकाती थी ,वह उस रोटी को खिड़की के सहारे रख दिया करती थी जिसे कोई भी ले सकता था .एक कुबड़ा व्यक्ति रोज उस रोटी को ले जाता और वजाय धन्यवाद देने के अपने रस्ते पर चलता हुआ वह कुछ इस तरह बडबडाता "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा ".दिन गुजरते गए और ये सिलसिला चलता रहा ,वो कुबड़ा रोज रोटी लेके जाता रहा और इन्ही शब्दों को बडबडाता "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा ".वह औरत उसकी इस हरकत से तंग आ गयी और मन ही मन खुद से कहने लगी कि "कितना अजीब व्यक्ति है ,एक शब्द धन्यवाद का तो देता नहीं है और न जाने क्या क्या बडबडाता रहता है ,मतलब क्या है इसका ".एक दिन क्रोधित होकर उसने एक निर्णय लिया और बोली "मैं इस कुबड़े से निजात पाकर रहूंगी ".और उसने क्या किया कि उसने उस रोटी में जहर मिला दीया जो वो रोज उसके लिए बनाती थी और जैसे ही उसने रोटी को को खिड़की पर रखने कि कोशिश कि अचानक उसके हाथ कांपने लगे और रुक गये और वह बोली "हे भगवन मैं ये क्या करने जा रही थी ?" और उसने तुरंत उस रोटी को चूल्हे कि आँच में जला दीया .एक ताज़ा रोटी बनायीं और खिड़की के सहारे रख दी ,हर रोज कि तरह वह कुबड़ा आया और रोटी लेके "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा " बडबडाता हुआ चला गया इस बात से बिलकुल बेखबर कि उस महिला के दिमाग में क्या चल रहा है .
हर रोज जब वह महिला खिड़की पर रोटी रखती थी तो वह भगवान से अपने पुत्र कि सलामती और अच्छी सेहत और घर वापसी के लिए प्रार्थना करती थी जो कि अपने सुन्दर भविष्य के निर्माण के लिए कहीं बाहर गया हुआ था .महीनों से उसकी कोई खबर नहीं थी. शाम को उसके दरवाजे पर एक दस्तक होती है ,वह दरवाजा खोलती है और भोंचक्की रह जाती है ,अपने पुरता को अपने सामने खड़ा देखती है.वह पतला और दुबला हो गया था. उसके कपडे फटे हुए थे और वह भूखा भी था ,भूख से वह कमजोर हो गया था. जैसे ही उसने अपनी माँ को देखा, उसने कहा, "माँ, यह एक चमत्कार है कि मैं यहाँ हूँ. जब मैं एक मील दूर है, मैं इतना भूखा था कि मैं गिर. मैं मर गया होता, लेकिन तभी एक कुबड़ा वहां से गुज़र रहा था ,उसकी नज़र मुझ पर पड़ी और उसने मुझे अपनी गोद में उठा लीया,भूख के मरे मेरे प्राण निकल रहे थे मैंने उससे खाने को कुछ माँगा ,उसने नि:संकोच अपनी रोटी मुझे यह कह कर दे दी कि "मैं हर रोज यही खाता हूँ लेकिन आज मुझसे ज्यादा जरुरत इसकी तुम्हें है सो ये लो और अपनी भूख को तृप्त करो " .जैसे ही माँ ने उसकी बात सुनी माँ का चेहरा पिला पड़ गया और अपने आप को सँभालने के लिए उसने दरवाजे का सहारा लीया ,उसके मस्तिष्क में वह बात घुमने लगी कि कैसे उसने सुबह रोटी में जहर मिलाया था .अगर उसने वह रोटी आग में जला के नष्ट नहीं की होती तो उसका बेटा उस रोटी को खा लेता और अंजाम होता उसकी मौत और इसके बाद उसे उन शब्दों का मतलब बिलकुल स्पष्ट हो चूका था "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा "

निष्कर्ष ~हमेशा अच्छा करो और अच्छा करने से अपने आप को कभी मत रोको फिर चाहे उसके लिए उस समय आपकी सराहना या प्रशंसा हो या न हो .अगर आपको ये कहानी पसंद आई हो तो इसे दूसरों के साथ शेयर करें ,मैं आपसे शर्त लगाने के लिए तैयार हूँ कि ये बहुत लोगों के जीवन को छुएगी 

Saturday, March 3, 2012

बृज के धार्मिक स्वरुप को होली  चार चाँद लगा देती है  

Monday, February 27, 2012

श्री राधे
            बहुत दिनों से कोई बात नहीं हुई , परन्तु आज कुछ कहने का मन है ,
                  होली जो पूरे विश्व में विभिन्न रूपों में मनाई जाती है पर भारत में इसका खास रंग है , भारत में भी बृज में होली का खास महत्त्व है , भगवान कृष्ण बृज में बृज वासियों के साथ होली खेलते थे , बृज की होली के बारे में कहावत है की " जग होरी ,बृज होरा"
                 बृज में होली 48   दिन  खेली जाती है , माघ शुक्ल  पंचमी (बसंत पंचमी ) से चैत्र कृष्ण अष्टमी तक खेली जाने वाली होली में फागुन शुक्ल अष्टमी से ( बरसाने की लठ्ठ मार होली ) से लेकर अगले दिन नवमी को नन्द गाँव की होली , एकादशी को वृन्दावन में सारे मंदिरों में होली तथा विशेष रूप से बनके बिहारी जी की टेशू के फूलों के रंग से ,  राधाबल्लभ जी की होली की सवारी , पागल बाबा की होली की सवारी आदि उल्लेखनीय हैं , साथ ही कृष्ण जन्म स्थान पर हुरंगा , होलिका दहन के दिन फालैन में पंडा ( प्रह्लाद के स्वरुप ) का जलती होली से निकलना भी प्रमुख आयोजन है 
                   अगले दिन सारे देश के साथ धूल (धुलेडी) की धूम केबाद भी तृतीया को को बलदेव ( दाउजी) में हुरंगा की भी अपनी शान है , होली का अंतिम आयोजन उत्तरभारत के सबसे विशाल रंगनाथ मंदिर की चैत्र शुक्ल अष्टमी को निकलने वाली होली की सवारी होती है
                                                                                      जय श्री राधे   

Tuesday, February 21, 2012

जय श्री राधे
                  बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं , एसा व्यस्तता के कारण हुआ , कुछ जो समय मिला वो फेसबुक की भेंट चढ़ गया पर आज कुछ लिखने का मन है
                 बृज की होरी पूरे संसार मैं प्रसिद्द है, आज का विषय बृज की  होली  

Thursday, December 8, 2011

रंग नाथ जी का मन्दिर 
श्री सम्प्रदाय के संस्थापक रामानुजाचार्य के विष्णु-स्वरूप भगवान रंगनाथ या रंगजी के नाम से रंग जी का मन्दिर सेठ लखमीचन्द के भाई सेठ गोविन्ददास और राधाकृष्ण दास द्वारा निर्माण कराया गया था। उनके महान गुरु संस्कृत के उद्भट आचार्य स्वामी रंगाचार्य द्वारा दिये गये मद्रास के रंग नाथ मन्दिर की शैली के मानचित्र के आधार पर यह बना था। इसकी लागत पैंतालीस लाख रुपये आई थी। इसकी बाहरी दीवार की लम्बाई 773 फीट और चौड़ाई 440 फीट है। मन्दिर के अतिरिक्त एक सुन्दर सरोवर और एक बाग़ भी अलग से इससे संलग्न किया गया है। मन्दिर के द्वार का गोपुर काफ़ी ऊँचा है। भगवान रंगनाथ के सामने साठ फीट ऊँचा और लगभग बीस फीट भूमि के भीतर धँसा हुआ तांबे का एक ध्वज स्तम्भ बनाया गया। इस अकेले स्तम्भ की लागत दस हज़ार रुपये आई थी। मन्दिर का मुख्य द्वार 93 फीट ऊँचे मंडप से ढका हुआ है। यह मथुरा शैली का है। इससे थोड़ी दूर एक छत से ढका हुआ निर्मित भवन है, जिसमें भगवान का रथ रखा जाता है। यह लकड़ी का बना हुआ है और विशालकाय है। यह रथ वर्ष में केवल एक बार ब्रह्मोत्सव के समय चैत्र में बाहर निकाला जाता है। यह ब्रह्मोत्सव-मेला दस दिन तक लगता है। प्रतिदिन मन्दिर से भगवान रथ में जाते हैं। सड़क से चल कर रथ 690 गज़ रंगजी के बाग़ तक जाता है जहाँ स्वागत के लिए मंच बना हुआ है। इस जलूस के साथ संगीत, सुगन्ध सामग्री और मशालें रहती हैं। जिस दिन रथ प्रयोग मे लाया जाता है, उस दिन अष्टधातु की मूर्ति रथ के मध्य स्थापित की जाती है। इसके दोनों ओर चौरधारी ब्राह्मण खड़े रहते हैं। भीड़ के साथ सेठ लोग भी जब-तब रथ के रस्से को पकड कर खींचतें हैं। लगभग ढ़ाई घन्टे के अन्तराल में काफ़ी जोर लगाकर यह दूरी पार कर ली जाती है। अगामी दिन शाम की बेला में आतिशबाजी का शानदार प्रदर्शन किया जाता है। आसपास के दर्शनार्थियों की भीड़ भी इस अवसर पर एकत्र होती है। अन्य दिनों जब रथ प्रयोग में नहीं आता तो भगवान की यात्रा के लिए कई वाहन रहते हैं- कभी जड़ाऊ पालकी तो कभी पुण्य कोठी, तो कभी सिंहासन होता है। कभी कदम्ब तो कभी कल्पवृक्ष रहता है। कभी-कभी किसी उपदेवता को भी वाहन के रूप में प्रयोग किया जाता है। जैसे- सूरज, गरुड़, हनुमान या शेषनाग। कभी घोड़ा, हाथी, सिंह, राजहंस या पौराणिक शरभ जैसे चतुष्पद भी प्रयोग में लाये जाते हैं।
इस समारोह में लगभग पॉँच हज़ार रुपये की धनराशि व्यय की जाती है। वर्ष भर के रख-रखाव का व्यय सत्तावन हज़ार से कम नहीं होता। इसमें से तीस हज़ार की सबसे बड़ी मद तो भोग में ही ख़र्च होती है। भगवान के सामने रखा जाने वाला यह भोग पुजारियों द्वारा प्रयोग कर लिया जाता है या दान कर दिया जाता है। प्रतिदिन पाँच सौ श्री संम्प्रदाय अनुयायी वैष्णवों को जिमाया जाता है। प्रत्येक सवेरे दस बजे तक आटे का पात्र किसी भी प्रार्थना कर्त्ता को दे दिया जाता है। मन्दिर से 33 गाँवों की जायदाद लगी हुई है। इससे एक लाख सत्रह हज़ार रुपये की आय होती है। इसमें से शासन चौसठ हज़ार रुपये लेता है। इन तैंतीस गाँवों में से चौथाई वृन्दावन समेत तेरह गाँव मथुरा में पड़ते हैं और बीस आगरा ज़िले में। साल भर में भेंट चढ़ावा बीस हज़ार रुपये के लगभग मूल्य का आता है। निधियों में लगाए गए धन से ग्यारह हज़ार आठ सौ रुपये का ब्याज मिलता है।
सन् 1868 में स्वामी ने पूरी जमींदारी एक प्रबंध समिति को हस्तान्तिरित कर दी थी। इसमें दो हज़ार रुपये की टिकटें लगीं थी। स्वामी के बाद श्री निवासाचार्य को नामजद किया गया था, जो अपने पूर्वज की भाँति विद्वान न होकर सामान्य जन की भाँति शिक्षित था। उसके दुराचरण के कारण व्यवस्था करने की आवश्यकता आ पड़ी। उसकी लम्पटता जगजाहिर और कुख्यात थी। उसकी फ़िज़ूलख़र्ची की कोई सीमा नहीं थी। अपने पिता के निधन के बाद वह कुछ गुज़ारा भत्ता पाता रहा। मन्दिर की व्यवस्था-सेवा के लिए मद्रास से दूसरे गुरु लाये गये। जमींदारी पूरी तरह छ: सदस्यों की एक समिति के नियंत्रण में रही। इनमें से सबसे उत्साही सेठ नारायण दास थे। सेठ को न्यासियों का मुख़्तार आम बनाया गया था। मन्दिर की बीस लाख की सम्पत्ति इसी सेठ के नाम कर दी गई। इस सुप्रबन्ध के बाद उत्सव समारोहों के आयोजनों में कोई गिरावट नहीं आने पाई और न दातव्यों की उदारता ही घटी बल्कि दफ़्तर के वैतनिक व्यय में भी कमी हुई। प्राभूत वाले गाँवों में से तीन गाँव महावन में और दो जलेसर में थे।
जयपुर नरेश मानसिंह ने रंगजी मन्दिर को ये दान किये थे। यद्यपि वह राज सिंहासन का वैधानिक उत्तराधिकारी था फिर भी वह उस पर कभी न बैठा। राजा पृथ्वीसिंह की रानी के गर्भ से वह उसके निधनोपरांत पैदा हुआ था। सन् 1779 ई॰ में पृथ्वीसिंह की मृत्यु के बाद उनके भाई प्रताप सिंह ने उत्तराधिकार का दावा किया। दौलतराव सिंधिया ने इससे भतीजे मानसिंह का अधिकार रोक दिया। मानसिंह युवा राजकुमार था और साहित्य और धर्म के प्रति समर्पित था। तीस हज़ार रुपये वार्षिक आय के आश्वासन पर राजा की उपाधि त्यागकर वह वृन्दावन वास करने लगा। उसने कठिन धार्मिक नियमों के पालन में शेष जीवनकाल यहीं व्यतीत किया। सत्तर वर्ष की आयु में सन् 1848 में उसका वहीं निधन हुआ। सत्ताईस वर्ष पर्यंत पालथी मारे एक ही मुद्रा में बैठा रहा। वह अपने आसन से नही उठता था। सप्ताह में बस एक बार ही प्राकृतिक विवशता वश आसन छोड़ता था। पाँच दिन पूर्व ही उसने अपने अन्त की भविष्यवाणी की थी और अपने बूढे सेवकों की देखभाल करने की प्रार्थना सेठ से की थी। उनमें से लक्ष्मी नारायण व्यास नामक एक सेवक सन् 1874 तक अपनी मृत्यु पर्यन्त मन्दिर की जमींदारी का प्रबन्धक बना रहा।

Thursday, October 13, 2011

श्याम सुन्दर मंदिर वृन्दावन की परिक्रमा कर हम लोट रहे थे , अचानक एक रिक्शा वाला आया , 'राधे राधे 'आवाज़ आयी सुनकर हमने रास्ता दिया और वो निकल गया , वृन्दावन मैं रिक्शे वाले इसी प्रकार रास्ता मांगते हैं , और चले जाते हैं , लोंगों को अचानक राधे राधे की आवाज़ सुनकर लगता है की कोई आरहा है , मोबाईल फोन पर बात करने के लिए लोग बात चीत राधे राधे से ही शुरु करते हैं , एसा है वृन्दाबन , 

Sunday, August 21, 2011

जन्माष्टमी,भगवान श्री कृष्ण का जन्म दिवस

जय श्री राधे 
                 कल जन्माष्टमी है , भगवान श्री कृष्ण का जन्म दिवस , सर्व प्रथम सभी पाठकों को लल्ला के जन्म दिन की बधाई ! बृज मैं इस दिन घर घर मैं कान्हा का जन्म दिन मनाया जाता है ,इस बृज के हर घर मैं कान्हा जन्म लेंगे ,मुख्य कार्यक्रम श्री कृष्णजन्म स्थान , मथुरा पर होता है ,हर मंदिर में इस दिन लल्ला के जन्म का उत्सव मनाया जाता है , अगले दिन गोकुल में नन्द बाबा के घर कृष्ण के पहुँचने का उत्सव "नंदोत्सव" मनाया जाता है , इस दिन मिठाई, खिलोने,सिक्के आदि खूब लुटाये जाते हैं ,मुंबई में गोविंदा 'मटकी फोड़ ' नंदोत्सव का 
 ही रूप है , इस दिन वृन्दावन में रंग जी के मंदिर में लठ्ठे का मेला होता है जो नंदोत्सव ही है 
                   आगे फिर कभी 
                                                                                                           श्री राधे


Thursday, July 28, 2011

राधे राधे 
             वृन्दाबन धाम मैं सावन का महीना आनंद का है ! चारों ओर भगवान के झूलों की बहार है !हर मंदिर मैं सावन के महीने में हिंडोलों में भगवान के दर्शन का सोभाग्य मिलता है ! बाँके बिहारी जी का झूला साल में एक दिन " हरियाली तीज"  पर ही होता है ! उस दिन बाँकेबिहारी जी उस दिन शाम ४ बजे से रत १२ बजे तक झोले में बिराजते हैं और भक्तों को दर्शन देते हैं 

Friday, July 1, 2011

श्री निधि वन मंदिर

जय श्री राधे 
                आज का विषय रहेगा श्री निधि वन मंदिर ,जो मधुबन का अपभ्रंश है ! यह स्थान भगवान कृष्ण की क्रीडा भूमि है , जहाँ वे राधा रानी के साथ बांसुरी बजा कर नाचा करते थे , साथ मैं गोपियाँ भी नाचा करती थी !आज भी वृन्दाबन जो कंक्रीट का वन बनता जा रहा है , परन्तु श्री निधि वन को सुरख्यित रखा गया है , कहा जाता है यहाँ आज भी रत को भगवान श्री राधा रानी व गोपियों के साथ रासलीला करते हैं , रात मैं मंदिर मैं कोई नहीं रहता है , पुजारी भी मंदिर बंद करके परिसर से बाहर चलेजाते हैं 
                                                                                               जय श्री राधे  

Shri Nidhivan Raj

जय श्री राधे 
                   आज ka 

Thursday, June 23, 2011

वृन्दाबन के बारे मैं जानकारी के लिए पड़ते रहें , मेरा ये ब्लाग  "वृन्दाबनधाम .ब्लाग स्पोट .कॉम "

सेवा कुञ्ज ,कृष्ण द्वारा राधा रानी की चरण सेवा

 जय श्री राधे 
                   अनेक दिनों से राजनीत की ,बहस  मैं उलझ गया , जिस से मूल उद्देश्य से भटक गया ! पुनः अपनी बात पर आते है ! 
                     आज का मंदिर है श्री सेवा कुञ्ज , जहाँ भगवान श्री कृष्ण ने श्री राधा रानी की चरण सेवा की थी !जब महारास के बाद श्री राधा रानी जी थक गयी तो सेवा कुञ्ज की छावं मैं बैठ गयी , परन्तु उनके थकन नहीं गयी , सब लोग अपने घरों को जाने लगे , तो भगवान ने कहा कि आप भी चलो , र्धरानी ने कहा कि मैं बहुत थक गयी हूँ , अब नहीं चल सकती ,और इतना कह कर नेत्र बंद कर लिए , तो भगवान ने श्री राधा रानी के  चरण दबाना प्रारंभ कर दिया , राधा जी इतनी थक गयी कि नेत्र खोल कर देखे बिना नींद मैं चली गयी , चरण दबाने से आराम मिला तो नीद और गहरी हो गयी , कृष्ण  जी चरण दबाते रहे और भोर हो गयी ! अचानक राधा रानी कि नींद खुली ,चरण दबाते देख पूछ लिया , आप क्या कर रहे हो , आप थक गयी थी न इस लिए चरण दबा रहा हूँ 
               आज भी सेवा कुञ्ज मैं राधा के चरण सेवा के दर्शन हैं 
        लोग इस लीला को सुन कर असहज हो जाते हैं , उन्हें ज्ञान नहीं है कि राधा , प्रभु की परम शक्ति हैं , न कि साधारण स्त्री , इसे समझाने के लिए मेरे पास शब्द नहीं , गुरूदेव कि कृपा से फिर कभी समझाऊंगा 
                                                                               जय श्री राधे 

Thursday, June 9, 2011

श्री राधे 
          पिछले कई महीने से कुछ लिखा नहीं ,ऐसा निजी कारणों से रहा ,
   पिछले हफ्ते बाबा रामदेव के अनशन पर केंद्र सरकार के कहर से दुःख पहुंचा , कि एक ऐसा आदमी जो किसी के साथ हिंसा कि बात नहीं कर रहा उस पर इस कदर डंडे का जोर दिखाना कहाँ कि बहादुरी है , ४ जून कि रात को हुए  घटना क्रम को सही नहीं ठहराया जा सकता ,बाबा का तरीका गलत हो सकता है बार बात सही है ,जितना धन विदेश में काले धन के रूप में जमा है उसे वापस लाया जाये तो देश पर जितना क़र्ज़ है वो चुकाया जा सकता है ,समाजवादी पार्टी के हाल के आगरा मे हुए  सम्मलेन मे सपा मुखिया ने भी इन बातों को उठाया था ,पर हाय  री राजनीती ,मुलायम सिंह सरकार को समर्थन कर रहे हैं ,बाबा नेताओं को चोर , बेईमान कहते है इस लिए बाबा पर डंडे बरसाए ,निर्दोष जनता को पीटा,ओरतों,बच्चों पर भी अत्याचार किया यह गलत ,अन्याय है ,कांगरेश के महा सचिव दिग्विजय सिंह ओसामा को जी   कह कर सम्भोदित करते है ,बाबा रामदेव को ठग कहते हैं , उन्हें शर्म आणि चाहिए ,में इस घटना कि निंदा करता हूँ ,आप सभी से प्राथना करता हूँ कि आप भी आपनी और से निंदा करें जिससे इन बेईमानों को लगे कि कितने लोग इन की करतूतों के विरोध में हैं 

Friday, November 19, 2010

radhe

श्री राधे
          राधा रानी श्याम सुन्दर जी के पवन धाम में इन दिनों कार्तिक मास कि धूम है , कार्तिक मास में कई बड़ी बृज चौरासी कोस कि यात्रा चलती रहती है जो बृज के स्वरूप कि असली पहचान  करवाती है , बृज देखना हो तो इन यात्राओं के साथ एक बार जरूर जाना चाहिए , असली बृज यहाँ के गाँव में वसता है , जो यहाँ कि संस्कृती को सहेजे हुए हैं , जैसे गोकुल , महावन बलदेव  , नंदगाँव , बरसाना ,गहवर वन ,गोवर्धन , भांडीर वन , राधारानी मानसरोवर , पानीगांव ( भागवत में जिसका फणीगाँव के नाम से वर्णन है , जिसके अनुसार कालिया नाग यहीं रहता था  ) आदि हैं जो बृज  कि यात्रा के पड़ावों  में से हैं ,राधा रानी के धाम में लक्ष्मी जी का एक प्राचीन मंदिर "बेलवन "के नाम से है जो यमुना के किनारे वृन्दाबन के दूसरी ओर स्थित है ,राधादामोदर मंदिर में कार्तिक मास में सबसे धूम रहती है क्योंकि  इस मंदिर  में अतिप्राचीन श्री गिरिराज जी की शिला विराजमान है ,जिस की ७ (सात) परिक्रमा करने मात्र से गोवर्धन जी की एक परिक्रमा का पुण्य फल प्राप्त होता हैं 

Tuesday, November 9, 2010

जय श्री राधे
                पिछली बार श्री गोविन्द देव जी के मंदिर के बारे में लिखा था , गोविन्द देव जी का मूल श्री विग्रह आज कल जयपुर में है , जो महल में बने गोविन्द देव मंदिर में विराजमान है , पुराने मंदिर के पीछे कि ओर नया मंदिर बना हुआ है दोनों मंदिर मिल कर अद्भुत रूप में गोविन्द देव कि महिमा बखान करते है ,

Monday, November 1, 2010

राधे राधे 
           बहुत दिनों से लिखना छह कर भी नहीं लिख पा रहा था , आज अवसर मिला है / 
 आज अप को वृन्दाबन के बहुत प्राचीन गोविन्द देव जी के मंदिर के बारें मैं बता रहा हूँ , यह जयपुर  के राजा  मानसिंह ने बनवाया था , ७ मंजिलों वाला यह मंदिर लाल पत्थर का बना था , जिस के ४ मंज़िल मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने गिरा दिए थे , ३ मंज़िलें के साथ आज भी यह वृन्दाबन का सबसे ऊंचा मंदिर है , आज कल इस की देख भाल की जिम्बेबारी  पुरातत्व बिभाग की है , स्थानीय लोगों मैं यह मंदिर भूतों  के मंदिर के नाम से प्रशिद्ध है क्योंकि एक किंवदंती है की प्राचीन कल मैं यह मंदिर एक रात मैं बन कर तेयार हुआ था , राजा मन सिंह ने बाद मैं केवल इस का जीर्णोद्धार करवा था