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Tuesday, March 28, 2023

श्री हिंगलाज माता मन्दिर

हिंगलाज मंदिर (नानी मन्दिर)
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पाकिस्तान के लसबेला से अरब सागर से छूकर निकलता 150 किमी तक फैला रेगिस्तान। बगल में 1000 फीट ऊँचे रेतीले पहाड़ों से गुजरती नदी। बाईं ओर दुनिया का सबसे विशाल मड ज्वालामुखी। जंगलों के बीच दूर तक परसा सन्नाटा और इस सन्नाटे के बीच से आती आवाज 'जय माता दी'। इन्हीं रास्तों में है धरती पर देवी माता का पहला स्थान माने जानेवाले पाकिस्तान स्थित एकमात्र शक्तिपीठ *'हिंगलाज मंदिर'*।

अमरनाथ जी से ज्यादा कठिन है हिंगलाज की यात्रा...
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करीब 2 लाख साल पुराने इस मंदिर में पिछले जन्मों के पाप भी नष्ट हो जाते हैं। इस मंदिर में नवरात्रि में गरबा से लेकर कन्या भोज तक सब होता है। देवी के *51 शक्तिपीठों* में से एक हिंगलाज मंदिर में नवरात्रि का जश्न करीब-करीब भारत जैसा ही होता है। कई बार इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है कि ये मंदिर पाक में है या भारत में। - हिंगलाज मंदिर जिस स्थान में है वो पाकिस्तान के सबसे बड़े हिंदू बाहुल्य इलाकों में से एक है। पूरे नवरात्रि यहां 3 किमी में मेला लगता है। दर्शन के लिए आनेवाली महिलाएं गरबा नृत्य करती हैं। पूजा-हवन होता है। कन्या खिलाई जाती हैं। माँ के भजनों की गूँज दूर-दूर सुनाई देती है। - कुल मिलाकर हर वो आस्था देखने को मिलती है जो भारत में नवरात्रि पूजा के दौरान होती है। नवरात्रि में हो जाती है साल भर के खर्चे के बराबर कमाई। - हिंगलाज मंदिर आनेवाले भक्तों की संख्या का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि नवरात्रि के 9 दिनों में यहाँ के लोग अपने साल भर के खर्चे के बराबर कमा लेते हैं। - मंदिर के प्रमुख पुजारी महाराज *श्री गोपाल गिरी जी* का कहना है कि नवरात्रि के दौरान भी मंदिर में हिंदू-मुस्लिम का कोई फर्क नहीं दिखता है। कई बार पुजारी-सेवक मुस्लिम टोपी पहने दिखते हैं। तो वहीं मुस्लिम भाई देवी माता की पूजा के दौरान साथ खड़े मिलते हैं। इनमें से अधिकतर *बलूचिस्तान-सिंध* के होते हैं। - हर साल पड़ने वाले 2 नवरात्रों में यहाँ सबसे ज्यादा भीड़ होती है। करीब 10 से 25 हजार भक्त रोज़ माता के दर्शन करने हिंगलाज आते हैं। इनमें अमेरिका, ब्रिटेन, बांग्लादेश और पाकिस्तान के आस-पास के देश प्रमुख हैं। - चूंकि, हिंगलाज मंदिर को मुस्लिम *'नानी बीबी की हज'* या *पीरगाह* के तौर पर मानते हैं, इसलिए पीरगाह पर अफगानिस्तान, इजिप्ट और ईरान जैसे देशों के लोग भी आते हैं। *शिवजी* की पत्नी *माता सती* का सिर कटकर गिरने से बना *'हिंगलाज'* हिन्दू धर्म, शास्त्रों और पुराणों के मुताबिक, सती के पिता राजा दक्ष अपनी बेटी का विवाह भगवान शंकर से होने से खुश नहीं थे। क्रोधित दक्ष ने बेटी का बहुत अपमान किया था। इससे दुखी सती ने खुद को हवनकुंड में जला डाला। इसे देखकर शंकर के गण ने राजा दक्ष का वध कर दिया था। घटना की खबर पाते ही शंकरजी दक्ष के घर पहुँचे। फिर सती के शव को कंधे पर उठाकर क्रोध में नृत्य करने लगे। शंकरजी को शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने चक्र से सती के 51 टुकड़े कर दिए। ये टुकड़े जहाँ-जहाँ गिरे, उन 51 जगहों को ही देवी शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है। टुकड़ों में से सती के शरीर का पहला हिस्सा यानी सिर *'किर्थर पहाड़ी'* पर गिरा, जिसे आज *हिंगलाज* के नाम से जानते हैं। इसी पहले हिस्से यानी सिर के चलते *पाकिस्तान* के *हिंगलाज मंदिर* को धरती पर माता का पहला स्थान कहते हैं।
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Monday, March 27, 2023

षष्ठम माँ कात्यायनी

भगवान कृष्ण की नगरी में वृन्दावन में भी देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक कात्यायनी पीठ स्थित है। इस मंदिर का नाम प्राचीन सिद्धपीठ में आता है। बताया जाता है कि यहां माता सती के केश गिरे थे, इसका प्रमाण शास्त्रों में मिलता है। नवरात्र के अवसर पर देश-विदेश से लाखों भक्त माता के दर्शन करने के लिए यहां आते हैं। बताया जाता है कि राधारानी ने भी श्रीकृष्ण को पाने के लिए इस शक्तिपीठ की पूजा की थी।

श्रीमद् भागवत में किया गया है उल्लेख

देवर्षि श्री वेदव्यास जी ने श्रीमद् भागवत के दशम स्कंध के 22वें अध्याय में उल्लेख किया है-

कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नम:॥

हे कात्यायनि! हे महामाये! हे महायोगिनी! हे अधीश्वरि! हे देवि! नन्द गोप के पुत्र हमें पत‍ि के रूप में प्राप्‍त हों। हम आपकी अर्चना एवं वंदना करते हैं।

इसलिए भगवान ने किया महारास

गीता के अनुसार, राधारानी ने गोपियों के साथ भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए कात्यायनी पीठ की पूजा की थी। माता ने उन्हें वरदान दे दिया लेकिन भगवान एक और गोपियां अनेक, ऐसा संभव नहीं था। इसके लिए भगवान कृष्ण ने वरदान को साक्षात करने के लिए महारास किया।

नवरात्र के दौरान माता के इस मंदिर में महिलाओं का प्रवेश रहता है वर्जित।

प्रत्येक मनोकामना होती है पूरी।

तब से आज तक यहां कुंवारे लड़के और लड़कियां नवरात्र के अवसर पर मनचाहा वर और वधु प्राप्त करने के लिए माता का आशीर्वाद पाने के लिए आते हैं। मान्यता है जो भी भक्त सच्चे मन से माता की पूजा करता है, उसकी मनोकामना शीघ्र पूरी होती है।

भगवान कृष्ण ने भी की थी पूजा

स्थानीय निवासियों के अनुसार, भगवान कृष्ण ने कंस का वध करने से पहले यमुना किनारे माता कात्यायनी को कुलदेवी मानकर बालू से मां की प्रतिमा बनाई थी। उस प्रतिमा की पूजा करने के बाद भगवान कृष्ण ने कंस का वध किया था। प्रत्येक वर्ष नवरात्र के अवसर पर यहां मेले का भी आयोजन किया जाता है।

इन्होंने करवाया मंदिर का निर्माण

कात्यायनी पीठ मंदिर का निर्माण फरवरी 1923 में स्वामी केशवानंद ने करवाया था। मां कात्यायनी के साथ इस मंदिर में पंचानन शिव, विष्णु, सूर्य तथा सिद्धिदाता श्री गणेश की मूर्तियां हैं। मंदिर का आध्यात्मिक वातावरण देखते ही श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो जाते हैं और दिल और दिमाग में शांति पाते हैं।

                                                      

जय माता दी🙏

Tuesday, September 27, 2022

टेसू , झांझी उत्तर भारत की परंपरा

 उत्तर भारत में एक प्राचीन परंपरा टेसू और झाझी की है धीरे धीरे आधुनिकता में नगरों में यह लुप्त हो रही है परन्तु जैसा सभी जानते है भारत व उसकी परंपराओं की जड़ गांवों में है। जिसका वर्णन शास्त्रों में मिलता है ।

ब्रजलोक में विशेष रूप से प्रचलित है। लड़के टेसू, जो मनुष्य की आकृति का खिलौना होता है, लेकर द्वार-द्वार पर घूमते हैं, टेसू के गीत गाते है और पैसे माँगते हैं। विषय की दृष्टि से यह गीत बहुत ही ऊटपटाँग और अद्भुत कहे जा सकते हैं, किन्तु ये बड़े मनोरंजक होते हैं। टेसू को जनश्रुति एक प्राचीन वीर के रूप में स्मरण करती है। जिसका वर्णन
खाटू श्यामजी महाभारत के बर्बरीक के रूप हैं, जिन्हें भगवान श्री कृष्ण ने खाटू श्याम नाम दिया। मान्यता है कि श्रीकृष्ण कलयुगी अवतार के रूप में खाटू श्यामजी खाटू में विराजित हैं। इन्हें कलयुग के अवतार, श्याम सरकार, तीन बाणधारी, खाटू नरेश व अन्य नामों से भी पुकारा जाता है। 

पूर्णिमा के दिन टेसू तथा झाँझी का विवाह भी रचाया जाता है। सांझी और टेसू के खेल अधिकांश उत्तर भारत में लोकप्रिय है। टेसू की अपनी ही छटा है। टेसू का खेल उत्तर भारत और आसपास के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खेला जाता है, यहां इसे बालक ही नहीं युवा भी खेलते हैं। सांझी बनाते समय बालिकायें जो गीत गाती हैं वे तो पूरे के पूरे प्रादेशिक भाषा के होते हैं।

आमतौर पर टेसू का स्टैण्ड बांस का बनाया जाता है जो तीन बाणों का रूप है तथा जिसमें मिट्टी की तीन पुतलियां फिट कर दी जाती हैं। जो क्रमश: टेसू राजा, दासी और चौकीदार की होती है या टेसू राजा और दो दासियां होती हैं। मध्य में मोमबत्ती या दिया रखने का स्थान होता है।
टेसू जो कि का खाटू श्याम जी का रूपांतरण है, श्याम बाबा की कहानी महाभारत से शुरू होती है। वे पहले बर्बरीक के नाम से जाने जाते थे। वे महान पांडव भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र हैं। बाल्यकाल से ही वे वीर और महान योद्धा थे। उन्होंने युद्ध कला अपनी मां से सीखी। इसके अलावा उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और तीन अभेध्य बाण प्राप्त किए और तीन बाणधारी का प्रसिद्ध नाम प्राप्त किया। वहीं अग्नि देव ने प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया, जो कि उन्हें तीनों लोकों में विजयी बनाने में समर्थ थे। 

महाभारत के युद्ध में मां की आज्ञा लेकर बर्बरीक युद्ध में अर्जुन का साथ देने जा रहे थे तभी मां ने उनसे कहा की तुम उसकी तरफ से युद्ध करोगे जो हार रहा होगा। इधर, भगवान श्री कृष्ण सब कुछ जान लिया और उन्होंने ब्राह्मण के रूप में उनकी परीक्षा ली उनसे पूछा की तुम्हें तीन बाण प्राप्त हुए हैं और तुम अर्जुन की तरह से लड़ोगे तो कौरव खत्म हो जाएगा और फिर वचन अनुसार कौरव की तरह से लड़ोगे तो ये खत्म हो जाएंगे। इस पर बर्बरीक ने उपाय पूछा कि तो फिर हमें क्या करना चाहिए। कृष्ण ने उनका सिर मांग लिया इस पर उन्होंने अपना सिर भगवान कृष्ण को दे दिया। कृष्ण ने ऐसे बलिदान से प्रसन्न होकर वरदान दिया कि कलियुग में तुम श्याम के नाम से जाने जाओगे, क्योंकि कलयुग में हारे गए का साथ देने वाला एक ही श्याम नाम धारण करने वाला समर्थ है और खाटू नगर तुम्हारा धाम बनेगा। तुम्हारे सिर को खाटू में दफनाया जाएगा। वहीं तुम्हरी मां के वचन अनुसार जो भक्त हार गया हो तुम उसके सहारा बनोगे।

पारम्परिक टेसू की आँखों और नाक तथा इसके मुख के स्थान पर कौड़ी चिपकाई जाती है। अतः चार कौड़ियों की आवश्यकता होती है। बाद में ये कौड़ियाँ सँभालकर रख ली जाती हैं क्योंकि इनको शुभ और कल्याणकारी माना जाता है।

टेसू रे टेसू घंटार बजाना,
इक नगरी दस गाँव बसाना।

उड़ गए तीतर रह गए मोर,
गबरू बैल को ले गए चोर
चोरों के घर खेती हुई,
खाके  चोरनी मोटी हुई,

मोटी होके मायके आई,
देख हँसे सब लोग लुगाई,

गुस्सा  होके पहुँची दिल्ली,
दिल्ली से लाई दो बिल्ली,
एक बिल्ली कानी,
सब बच्चों की नानी,

नानी नानी टेसू आया,
संग में अपने झाँझी लाया,

मेरा टेसू यहीं अड़ा,
खाने को माँगे दही बड़ा,

दही बड़ा हो हइया, झट निकाल रुपइया,
रुपए के तो ला अखरोट,
मुझको दे दे सौ का नोट।

मेरा टेसू यहीं खड़ा
मेरा दही बड़ा टेसू यहीं अड़ा,
खाने को माँगे दही बड़ा,

दही बड़ा बहुतेरा,
खाने को मुँह टेढ़ा। 

मथुरा को जाएँगे, चार कौड़ी लाएँगे

कौड़ी अच्छी हुई तो, टेसू में लगाएँगे,
टेसू अच्छा हुआ तो, गाँव में घुमाएँगे,
गाँव अच्छा हुआ तो, चक्की लगबाएँगे,
चक्की अच्छी हुई तो, आटा पिसवाएँगे,
आटा अच्छा हुआ तो, पूए बनवाएँगे,

पूए अच्छे हुए तो, गपगप खा जाएँगे,

खाकर अच्छा लगा तो बाग घूमने जाएँगे,

बाग अच्छा हुआ तो, माली को बुलाएँगे,

माली अच्छा हुआ तो, आम तुड़वाएँगे,

आम अच्छे हुए तो, घर भिजवाएँगे,

 घर भिजवाकर, अमरस बनवाएँगे,

 अमरस अच्छा हुआ तो, मथुरा ले जाएँगे।

कुसुम सरोवर, गोवर्धन पर्वत, मथुरा

ब्रज चौरासी कोस मंदिर दर्शन श्रंखला 

#कुसुम_सरोवर

यह राधाकुंड से तीन किमी० दूर गोवर्धन परिक्रमा
मार्ग में स्थित है।यहाँ पर किशोरी जी फूलमाला बनाकर स्यामसुंदर को पहनाती हैं।कुंड का नव निर्माण सीढ़ियाँ सन् 1767 में भरतपुर के प्रतापी राजा जवाहर सिंह ने कराया।घाट के पश्चिम दिशा में सूरजमल की छतरी है।दाऊजी का मंदिर और उत्तर दिशा में सूरजमल की छतरी है।उत्तर पश्चिम कोण पर उद्धव जी की बैठक है,पास में नारदकुंड तथा पास में ग्वालियर के राजा का मंदिर बना है।

गोवर्धनाद्दूरेण वृन्दारण्ये सखी स्थले।
प्रवत्त: कुसुमाम्भोषो कृष्ण संकीर्तनोत्सव:।।
(भागवत १०/२/३०)

कुसुम सरोवर ही बज्रनाभ व उनकी माँ ऊषा ने श्री मद्भागवत कथा का श्रवण किया।जो शुकदेव मुनि ने सुनाई।जो उद्धव जी ने परीक्षित को आदेशित किया।


Thursday, May 12, 2022

मोहिनी एकादशी

कल मोहिनी एकादशी थी, कहा जाता है कि मोहिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु ने सागर मंथन में निकले अमृत के लिए लड़ते हुए देवता और दैत्यों के बीच मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को अमृत कलश से अमृत पिलाया था, भगवान का मोहिनी रूप इतना सुन्दर था कि भगवान शंकर जी भी उन पर मोहित हो गए थे

Monday, March 21, 2022

रँगजी मन्दिर के ब्रह्मोत्सव (रथ के मेले) के अंतर्गत दूसरे दिन प्रातः काल स्वर्ण सूर्य प्रभा पर तथा सायं रजत हंस पर विराजमान होकर भगवान बगीचे में बिहार करने जाते हैं

रँगजी मन्दिर के ब्रह्मोत्सव (रथ के मेले) के अंतर्गत दूसरे दिन प्रातः काल स्वर्ण सूर्य प्रभा पर तथा सायं रजत हंस पर विराजमान होकर भगवान बगीचे में बिहार करने जाते हैं,
बगीचे में ठाकुर जी विश्राम करते हैं, भोग लगाया जाता है, सवारी पुनः भक्तों को दर्शन देते हुए मन्दिर में लौट जाती है

Sunday, March 20, 2022

रँगनाथ जी मन्दिर का ब्रह्मोत्सव

उत्तर भारत के सबसे बड़े मन्दिरों में सम्मिलित रँगनाथ जी का मन्दिर वृन्दावन धाम की नाक ऊँची करता है ,चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया से प्रारंभ होने वाला ब्रह्मोत्सव जिसे स्थानीय लोग रथ का मेला भी कहते हैं
प्रथम दिवस भगवान प्रातः सोने की पूर्ण कोठी में विराजमान होकर दर्शन देते हुए मन्दिर के बगीचा तक जाते हैं
सायं काल स्वर्ण सिंह पर सवार होकर बगीचा जाती है

Sunday, March 13, 2022

ब्रह्मांड घाट गोकुल महावन

ब्रज चौरासी कोस मंदिर दर्शन 71.

#ब्रह्मांड_घाट

यमुना पार महावन रमन रेती में जब भगवान कृष्ण ने मुख में मिट्टी खाई तो यशोदा माता सहज भाव से उनके मुख से मिट्टी निकालने लगीं जब मुख खोला तो देखकर दंग रह गयी पूरा ब्रह्मांड दिखाई दिया माँ डर गयी यह वही साक्षात स्थान है जो हमारे धर्मग्रंथों में वर्णित है।

यह विशेषता है इन स्थानों पर आज भी ब्रज में देखने पर हृदय को ऐसा आनंद प्राप्त होता है।ऐसी अनुभूति होने लगती है।ये कल्पना नहीं यथार्थ है।कुछ चित्र संलग्न हैं।

सवामन शालिग्राम

ब्रज चौरासी कोस मंदिर दर्शन श्रंखला 54

मंदिर सवामन शालिग्राम (प्राचीन)

यह मंदिर सन् 1770 में बना हुआ है।रामानुज सम्प्रदाय का यह मंदिर रीवा रियासत के राजा रघुराजसिंह के वंशजों ने बनवाया।ऐसे शालिग्राम विश्वभर में नहीं हैं।रीवा स्टेट के राजा के यहाँ इनकी सेवा होती थी।नैपाल मुक्तिनाथ से कभी रीवा आए थे।ठाकुर प्रेरणा से वृन्दावन मंदिर निर्माण की आज्ञा हुई।श्याम सुंदर मंदिर के सामने लोईबाजार में दिव्य मंदिर का निर्माण हुआ।

प्रथम सेवायत जयराम दास के हाथ में थी सन् 1826 में बालमुकुंद, फिर जनार्दन दास उसके बाद हरिप्रपन्नाचार्य तथा इनकी स्थापना बंगलौर के किसी भक्त द्वारा सवामन सोना तुलादान करके की गयी।वर्तमान में श्री राम आचार्य के आधिपत्य में है।

मंदिर के नीचे लोई बाजार में चौदह दुकानें मंदिर की हैं।जिनसे ठाकुरजी के भोगराग का खर्चा चलता है।

Monday, February 21, 2022

गोरे दाऊजी मन्दिर, परिक्रमा मार्ग वृन्दावन

ब्रज चौरासी कोस मंदिर दर्शन 

गोरे दाऊजी मंदिर 

यह ऐतिहासिक मंदिर श्री गोरे दाऊजी महाराज का
राजपुर ग्राम में स्थित सन् 1763 में "जीवाजी राव सिंधिया" राजा द्वारा बनवाया गया था वृन्दावन परिक्रमा में ऊँचे से चबूतरे पर एक बाबा हाथी रखते थे उनका नाम हाथी वाले बाबा कहते थे।
बाद में यह मंदिर अटल बिहारी ठाकुर परिक्रमा मार्ग में पहुँच गया 1950 से 1970 तक हाथी बाबा यहीं रहे।
यह रामानंदी साधु थे उनके पश्चात वैष्णवदास सेवानिष्ठ हुए।भक्तमाल के वक्ता सिद्ध महात्मा बाबा मथुरादास जी यहाँ विराजे।यहाँ सौ दो सौ साधु नित्य बने रहते हैं।यहाँ साधु सेवा निरंतर रहती है।
दाऊजी गोरे रंग की प्रतिमा है इसीलिए यह स्थान गोरे दाऊजी के नाम से प्रसिद्ध है।

Friday, February 18, 2022

कारे दाऊजी, अनाज मंडी ,वृन्दावन

ब्रज चौरासी कोस मंदिर दर्शन श्रंखला 56.

#मंदिर_कारे_दाऊजी

अनाजमंडी वृन्दावन में लगभग 500 वर्ष पुराना दाऊजी का मंदिर रेवती जी के साथ विराजित है।
जिस समय गोविंद देव प्रकट हुए राजा मानसिंह ने मंदिर निर्माण कराया।उससे भी पहिले का यह मंदिर है।मंदिर के दक्षिण में लालबिहारा नाम से जगह है।वहाँ एक तालाब था उसी में औरंगजेब के आक्रमण के समय दाऊजी को छिपाया गया था।औरंगजेब के बाद तालाब से निकालकर गोस्वामी मुरलीधर के पूर्वजों ने सेवा सँभाली।

मुरलीधर के बड़े भाई बिहारीलाल दोनों सेवा करते थे।पीछे मुरलीधर ब्रजेश के पुत्र घासीराम उनके दो पुत्र राधाचरन व हरचरन थे आजकल हरचरन जी के पुत्र विष्णु सेवायत हैं करौली महारानी ने 150 वर्ष पूर्व इनको दान कर दिया।

Tuesday, February 15, 2022

वृन्दावन के ठाकुर

श्री धाम में ठाकुरजी के श्री विग्रह के सम्बंधित जानकारी,

जुगल किशोर मन्दिर, केशीघाट वृन्दावन

ब्रज चौरासी कोस मंदिर दर्शन श्रंखला 

मंदिर युगल किशोर (प्राचीन)

यह मंदिर केशीघाट वृन्दावन के निकट है सन् 1607 में नोनकरण कछवाहा राजपूत ने बनवाया
यह गोपीनाथ मंदिर के निर्माता रायसेन सेखावत का छोटा भाई था।इसमें राधाकृष्ण युगल विराज मान हैं लाल पत्थरों में ऊँचा शिखर युक्त मंदिर बना है।किन्तु वर्तमान में गुम्बद विहीन है।

आजकल यह पुरातत्व विभाग के संरक्षण में हैमंदिर के द्वारा भाग की शिल्पकारी देखते बनती है।गोवर्धन धारी श्री कृष्ण के साथ ग्वाल बाल लठिया टेके हुए हैं।

ब्रजचौरासी कोस में ऐसे अनेक मंदिर हैं जिनमें काफी धन भी खर्च हुआ पर आज न वहाँ यात्री जाते हैं लेकिन दर्शनीय हैं।मेरा उद्देश्य है उनको प्रकाश में लाना किन्तु काल के प्रभाव से ओझल हो चुके हैं।जहाँ सिद्ध संतों का वास रहा है जो ब्रज से प्रभावित होकर यहाँ बसे थे।

कुसुम सरोवर, गोवर्धन पर्वत, मथुरा

ब्रज चौरासी कोस मंदिर दर्शन श्रंखला 51

#कुसुम_सरोवर

यह राधाकुंड से तीन किमी० दूर गोवर्धन परिक्रमा
मार्ग में स्थित है।यहाँ पर किशोरी जी फूलमाला बनाकर स्यामसुंदर को पहनाती हैं।कुंड का नव निर्माण सीढ़ियाँ सन् 1767 में भरतपुर के प्रतापी राजा जवाहर सिंह ने कराया।घाट के पश्चिम दिशा में सूरजमल की छतरी है।दाऊजी का मंदिर और उत्तर दिशा में सूरजमल की छतरी है।उत्तर पश्चिम कोण पर उद्धव जी की बैठक है,पास में नारदकुंड तथा पास में ग्वालियर के राजा का मंदिर बना है।

गोवर्धनाद्दूरेण वृन्दारण्ये सखी स्थले।
प्रवत्त: कुसुमाम्भोषो कृष्ण संकीर्तनोत्सव:।।
(भागवत १०/२/३०)

कुसुम सरोवर ही बज्रनाभ व उनकी माँ ऊषा ने श्री मद्भागवत कथा का श्रवण किया।जो शुकदेव मुनि ने सुनाई।जो उद्धव जी ने परीक्षित को आदेशित किया।

अशोक अज्ञ

बृज दर्शन,ग्वालियर मन्दिर, वृन्दावन

 ब्रज चौरासी कोस मंदिर शृंखला 


मंदिर ग्वालियर "ब्रह्मचारी का" प्राचीन


इस मंदिर का निर्माणकाल सन् 1860 है।गोपेश्वर महादेव के निकट महाराजा जीवाजी राव सिंधिया के पिता ने बनवाया पत्नी राजमाता विजया राजे सिंधिया तथा माधवराव सिंधिया के पिता थे ग्वालियर वालों के द्वारा बनवाया गया मंदिर में मुख्यत: ठाकुर राधागोपाल, हंस गोपाल एवं नृत्यगोपाल विराजित हैं मंदिर में पाँचों निम्बार्काचार्यों की मूर्तियाँ श्री हंस,सनक,नारद,एवं श्री निवास के रूप में दर्शन होते हैं।


राजा सिंधिया के गुरु श्री गिरधारी ब्रह्मचारी जी का मंदिर भी कहते हैं।मंदिर को बनवाकर जीवाजी ने अपने गुरू को अर्पण कर दिया था प्राचीन पच्चीकारी पत्थरों में कलात्मक ढंग की ऊँची सीढ़ियाँ देखने लायक हैं।


गिरधारी शरण जी को वाक्य सिद्धी थी बाद में गुरूजी ने रुष्ट होकर मंदिर छोड़ दिया बाद में छटीकरा के रास्ते गोपालगढ़ में अपने शिष्यों के साथ रहने लगे।


गिरधारी शरण देव का जन्म सन्1941 में सवाई माधोपुर के पास लसोड़ा ग्राम में हुआ था पिता महोवत राम सनाढ्य ब्राह्मण थे।


घर में बैलगाड़ियों से व्यापार होता था एक दिन बैलगाड़ी से जा रहे थे रास्ते में सिंह ने आक्रमण कर बैल को मार दिया इन पर कायरता का आरोप मढ़ते हुए भाभी ने डूब मरने को कहा।झोझा नामक झील में आत्महत्या करने के लिए डूबे लोगों ने बचा लिया।झील में सालिग्राम की एक मूर्ति मिली उसे ही लेकर वृन्दावन आ गये गुरू आदेश से तपस्या की तो वाक्यसिद्धि हो गयी उसी का चमत्कार जीवाजी ने देखा तो मंदिर इनको बनवाकर दिया।



Sunday, September 12, 2021

बल्देव छट

 ब्रज के राजा श्री दाऊ जी महाराज के जन्मोत्सव की बधाई


मथुरा के बलदेव में भगवान श्रीकृष्ण के अग्रज एवं ब्रज के राजा बलदेव दाऊजी का जन्मोत्सव मनाया जाएगा। सुबह चार बजे विशेष अभिषेक और हीरा जवाहरात के साथ श्री दाऊजी महाराज विशेष शृंगार किया जाएगा। लेकिन कोरोना संक्रमण के कारण इस बार श्रद्धालु मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकेंगे। 

भगवान के कृष्ण अवतार में यदुवंश में बलदेव जी प्रकट हुए। गर्ग संहिता में देवकी के सातवें गर्भ में बलदेव जी का आगमन हुआ। वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी कंस के भय से गोकुल में रहती थी। योग माया ने गर्भ को देवकी के उदर से रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया था। 

देवकी का सातवां गर्भ हर्ष और शोक वाला था। पांच दिन बाद भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि स्वाति नक्षत्र बुधवार थी, मध्याह्न के समय, तुला लग्न में पांच ग्रह उच्च थे, रोहिणी के गर्भ से नंद भवन में श्री बलदेव जी अवतरित हुए।


भूमि खोदकर निकाला गया था विग्रह


बलराम जी की विशाल मूर्ति श्रीकृष्ण के पौत्र श्री बज्रनाभ ने पूर्वजों की स्मृति में स्थापित कराई थी। यह मूर्ति द्वापर के बाद भूमिस्थ हो गई थी। मूर्ति पूर्व कुषाण कालीन है। गोकुल में श्रीमद् बल्लभाचार्य पौत्र गोस्वामी गोकुलनाथ जी को बलदेव जी ने स्वप्न दिया कि श्यामा गाय जिस स्थान पर दूध स्रवित करती है, उस भूमि में प्रतिमा है। 


भूमि की खोदाई कर विग्रह निकाला। श्री कल्याण देव जी को पूजा-अर्चना का भार सौंपा। तभी से श्री कल्याण देव जी के वंशज पूजा सेवा करते हैं। बलदेव जी का श्री विग्रह आठ फीट ऊंचा, साढ़े तीन फीट चौड़ा श्याम वर्ण है, पीछे शेष नाग सात फनों से युक्त छाया करते हैं। विग्रह नृत्य मुद्रा में है, दाहिना हाथ सिर से ऊपर वरद मुद्रा में है। बायें हाथ में चषक है।



Monday, January 27, 2020

मदन मोहन जी मन्दिर वृन्दावन

वृंदावन का सबसे प्राचीन मंदिर मदन मोहन जी जो कि सन1592
में मुल्तान निवासी रामदास कपूर ने निर्माण कराया।आजकल यह पुरातत्व विभाग के अधीन है।
चैतन्य महाप्रभु के छै प्रमुख शिष्यों में से सनातन गोस्वामी की सेवा में यह मंदिर बना।सन्1670 में इसे औरंगजेब के द्वारा तोड़ा गया।बाद में पुनर्निर्माण राजा गुणानंद ने कराया।
कहानी बड़ी रोचक है कृष्ण का काल लगभग 5000 साल का है।उनके बाद उनके प्रपौत्र बज्रनाभ ने ब्रज की धरोहरों को सुरक्षित किया।
लेकिन बाद में मुस्लिम आक्रान्ताओं ने तहस नहस कर दिया।उसी दौरान की यह मूर्ति जमीन में अद्वैत टीले के नीचे दबी पड़ी थी।स्वप्न हुआ तो इसे फिर स्थापित किया गया।
उस समय नावों से व्यापार चलता था बताते हैं रामदास कपूर की नाव यमुना में फँस गई जिसे भगवान के रूप में किसी बालक ने धक्का देकर निकाल दिया खुश होकर सेठ ने यह मंदिर बनबाया बाद में अकबर ने काफी जमीन ठाकुर के अस्तित्व में कर दी।फिर अन्य बादशाहों ने आतंक किया तो मूर्ति करौली में मदनमोहन जी के रूप में स्थापित कर दी।
इस मंदिर पर एक स्वर्ण कलश था राजा गुणानंद को मदनमोहन की सुरक्षा पर गर्व था। माँट गाँव का एक चोर था जिसने कलश उतारकर ले जाने की चेतावनी दी नीचे यमुना बहती थी।वह एक एक कील घंटे की चोट पर गाड़ता गया तथा कलश को लेकर यमुना में कूद गया।बाद में राजा ने उसे इनाम भी दिया।

Wednesday, December 11, 2019

56 भोग क्यों और क्या

56 भोग
 हिन्दू लोग भगवान को छप्पन भोग का प्रसाद चढ़ाते हैं
भगवान श्रीकृष्ण को 56 प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं जिसे 56 भोग कहा जाता है
 कथा के अनुसार माता यशोदा बालकृष्ण को एक दिन में अष्ट पहर भोजन कराती थी अर्थात बालकृष्ण 8 बार भोजन करते थे
 एक बार जब इन्द्र के प्रकोप से सारे व्रज को बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाया था, तब लगातार 7 दिन तक भगवान ने अन्न-जल ग्रहण नहीं किया
 8वें दिन जब भगवान ने देखा कि अब इन्द्र की वर्षा बंद हो गई है, तब सभी ब्रजवासियों को गोवर्धन पर्वत से बाहर निकल जाने को कहा
 तब दिन में 8 पहर भोजन करने वाले बालकृष्ण को लगातार 7 दिन तक भूखा रहना उनके ब्रजवासियों और मैया यशोदा के लिए बड़ा कष्टप्रद हुआ
 तब भगवान के प्रति अपनी अनन्य श्रद्धाभक्ति दिखाते हुए सभी ब्रजवासियों सहित यशोदा माता ने 7 दिन और अष्ट पहर के हिसाब से 7X8=56 व्यंजनों का भोग बालगोपाल को लगाया
 श्रीमद्भागवत कथा के अनुसार जब कृष्ण की गोपिकाओं ने उनको पति रूप में पाने के लिए 1 माह तक यमुना में भोर में ही न केवल स्नान किया, अपितु कात्यायिनी मां की पूजा-अर्चना की ताकि उनकी यह मनोकामना पूर्ण हो
 जब श्रीकृष्ण ने उनकी मनोकामना पूर्ति की सहमति दे दी तब गोपिकाओं ने 56 भोग का आयोजन करके भगवान श्रीकृष्ण को भेंट किया
 एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण राधिकाजी के साथ एक दिव्य कमल पर विराजते हैं उस कमल की कुल पंखुड़ियों की संख्या 56 होती है अत: 56 भोग से भगवान श्रीकृष्ण अपनी सखियों संग तृप्त होते हैं
 इनमे निम्नलिखित भोग आते हैं
> रसगुल्ला
> चन्द्रकला
> रबड़ी
> शूली
> दधी
> भात
> दाल
> चटनी
> कढ़ी
> साग-कढ़ी
> मठरी
> बड़ा
> कोणिका
> पूरी
> खजरा
> शरबत
> वाटी
> सिखरिणी
> मुरब्बा
> मधुर
> कषाय
> तिक्त
> कटु पदार्थ
> अम्ल {खट्टा पदार्थ}
> शक्करपारा
> घेवर
> चिला
> मालपुआ
> जलेबी
> मेसूब
> पापड़
> सीरा
> मोहनथाल
> लौंगपूरी
> खुरमा
> गेहूं दलिया
> पारिखा
> सौंफ़लघा
> लड़्ड़ू
> दुधीरुप
> खीर
> घी
> मक्खन
> मलाई
> शाक
> शहद
> मोहनभोग
> अचार
> सूबत
> मंड़का
> फल
> लस्सी
> मठ्ठा
> पान
> सुपारी
> इलायची