बृज के धार्मिक स्वरुप को होली चार चाँद लगा देती है
Saturday, March 3, 2012
Monday, February 27, 2012
श्री राधे
बहुत दिनों से कोई बात नहीं हुई , परन्तु आज कुछ कहने का मन है ,
होली जो पूरे विश्व में विभिन्न रूपों में मनाई जाती है पर भारत में इसका खास रंग है , भारत में भी बृज में होली का खास महत्त्व है , भगवान कृष्ण बृज में बृज वासियों के साथ होली खेलते थे , बृज की होली के बारे में कहावत है की " जग होरी ,बृज होरा"
बृज में होली 48 दिन खेली जाती है , माघ शुक्ल पंचमी (बसंत पंचमी ) से चैत्र कृष्ण अष्टमी तक खेली जाने वाली होली में फागुन शुक्ल अष्टमी से ( बरसाने की लठ्ठ मार होली ) से लेकर अगले दिन नवमी को नन्द गाँव की होली , एकादशी को वृन्दावन में सारे मंदिरों में होली तथा विशेष रूप से बनके बिहारी जी की टेशू के फूलों के रंग से , राधाबल्लभ जी की होली की सवारी , पागल बाबा की होली की सवारी आदि उल्लेखनीय हैं , साथ ही कृष्ण जन्म स्थान पर हुरंगा , होलिका दहन के दिन फालैन में पंडा ( प्रह्लाद के स्वरुप ) का जलती होली से निकलना भी प्रमुख आयोजन है
अगले दिन सारे देश के साथ धूल (धुलेडी) की धूम केबाद भी तृतीया को को बलदेव ( दाउजी) में हुरंगा की भी अपनी शान है , होली का अंतिम आयोजन उत्तरभारत के सबसे विशाल रंगनाथ मंदिर की चैत्र शुक्ल अष्टमी को निकलने वाली होली की सवारी होती है
जय श्री राधे
बहुत दिनों से कोई बात नहीं हुई , परन्तु आज कुछ कहने का मन है ,
होली जो पूरे विश्व में विभिन्न रूपों में मनाई जाती है पर भारत में इसका खास रंग है , भारत में भी बृज में होली का खास महत्त्व है , भगवान कृष्ण बृज में बृज वासियों के साथ होली खेलते थे , बृज की होली के बारे में कहावत है की " जग होरी ,बृज होरा"
बृज में होली 48 दिन खेली जाती है , माघ शुक्ल पंचमी (बसंत पंचमी ) से चैत्र कृष्ण अष्टमी तक खेली जाने वाली होली में फागुन शुक्ल अष्टमी से ( बरसाने की लठ्ठ मार होली ) से लेकर अगले दिन नवमी को नन्द गाँव की होली , एकादशी को वृन्दावन में सारे मंदिरों में होली तथा विशेष रूप से बनके बिहारी जी की टेशू के फूलों के रंग से , राधाबल्लभ जी की होली की सवारी , पागल बाबा की होली की सवारी आदि उल्लेखनीय हैं , साथ ही कृष्ण जन्म स्थान पर हुरंगा , होलिका दहन के दिन फालैन में पंडा ( प्रह्लाद के स्वरुप ) का जलती होली से निकलना भी प्रमुख आयोजन है
अगले दिन सारे देश के साथ धूल (धुलेडी) की धूम केबाद भी तृतीया को को बलदेव ( दाउजी) में हुरंगा की भी अपनी शान है , होली का अंतिम आयोजन उत्तरभारत के सबसे विशाल रंगनाथ मंदिर की चैत्र शुक्ल अष्टमी को निकलने वाली होली की सवारी होती है
जय श्री राधे
Tuesday, February 21, 2012
Thursday, December 8, 2011
रंग नाथ जी का मन्दिर
श्री सम्प्रदाय के संस्थापक रामानुजाचार्य के विष्णु-स्वरूप भगवान रंगनाथ या रंगजी के नाम से रंग जी का मन्दिर सेठ लखमीचन्द के भाई सेठ गोविन्ददास और राधाकृष्ण दास द्वारा निर्माण कराया गया था। उनके महान गुरु संस्कृत के उद्भट आचार्य स्वामी रंगाचार्य द्वारा दिये गये मद्रास के रंग नाथ मन्दिर की शैली के मानचित्र के आधार पर यह बना था। इसकी लागत पैंतालीस लाख रुपये आई थी। इसकी बाहरी दीवार की लम्बाई 773 फीट और चौड़ाई 440 फीट है। मन्दिर के अतिरिक्त एक सुन्दर सरोवर और एक बाग़ भी अलग से इससे संलग्न किया गया है। मन्दिर के द्वार का गोपुर काफ़ी ऊँचा है। भगवान रंगनाथ के सामने साठ फीट ऊँचा और लगभग बीस फीट भूमि के भीतर धँसा हुआ तांबे का एक ध्वज स्तम्भ बनाया गया। इस अकेले स्तम्भ की लागत दस हज़ार रुपये आई थी। मन्दिर का मुख्य द्वार 93 फीट ऊँचे मंडप से ढका हुआ है। यह मथुरा शैली का है। इससे थोड़ी दूर एक छत से ढका हुआ निर्मित भवन है, जिसमें भगवान का रथ रखा जाता है। यह लकड़ी का बना हुआ है और विशालकाय है। यह रथ वर्ष में केवल एक बार ब्रह्मोत्सव के समय चैत्र में बाहर निकाला जाता है। यह ब्रह्मोत्सव-मेला दस दिन तक लगता है। प्रतिदिन मन्दिर से भगवान रथ में जाते हैं। सड़क से चल कर रथ 690 गज़ रंगजी के बाग़ तक जाता है जहाँ स्वागत के लिए मंच बना हुआ है। इस जलूस के साथ संगीत, सुगन्ध सामग्री और मशालें रहती हैं। जिस दिन रथ प्रयोग मे लाया जाता है, उस दिन अष्टधातु की मूर्ति रथ के मध्य स्थापित की जाती है। इसके दोनों ओर चौरधारी ब्राह्मण खड़े रहते हैं। भीड़ के साथ सेठ लोग भी जब-तब रथ के रस्से को पकड कर खींचतें हैं। लगभग ढ़ाई घन्टे के अन्तराल में काफ़ी जोर लगाकर यह दूरी पार कर ली जाती है। अगामी दिन शाम की बेला में आतिशबाजी का शानदार प्रदर्शन किया जाता है। आसपास के दर्शनार्थियों की भीड़ भी इस अवसर पर एकत्र होती है। अन्य दिनों जब रथ प्रयोग में नहीं आता तो भगवान की यात्रा के लिए कई वाहन रहते हैं- कभी जड़ाऊ पालकी तो कभी पुण्य कोठी, तो कभी सिंहासन होता है। कभी कदम्ब तो कभी कल्पवृक्ष रहता है। कभी-कभी किसी उपदेवता को भी वाहन के रूप में प्रयोग किया जाता है। जैसे- सूरज, गरुड़, हनुमान या शेषनाग। कभी घोड़ा, हाथी, सिंह, राजहंस या पौराणिक शरभ जैसे चतुष्पद भी प्रयोग में लाये जाते हैं।
इस समारोह में लगभग पॉँच हज़ार रुपये की धनराशि व्यय की जाती है। वर्ष भर के रख-रखाव का व्यय सत्तावन हज़ार से कम नहीं होता। इसमें से तीस हज़ार की सबसे बड़ी मद तो भोग में ही ख़र्च होती है। भगवान के सामने रखा जाने वाला यह भोग पुजारियों द्वारा प्रयोग कर लिया जाता है या दान कर दिया जाता है। प्रतिदिन पाँच सौ श्री संम्प्रदाय अनुयायी वैष्णवों को जिमाया जाता है। प्रत्येक सवेरे दस बजे तक आटे का पात्र किसी भी प्रार्थना कर्त्ता को दे दिया जाता है। मन्दिर से 33 गाँवों की जायदाद लगी हुई है। इससे एक लाख सत्रह हज़ार रुपये की आय होती है। इसमें से शासन चौसठ हज़ार रुपये लेता है। इन तैंतीस गाँवों में से चौथाई वृन्दावन समेत तेरह गाँव मथुरा में पड़ते हैं और बीस आगरा ज़िले में। साल भर में भेंट चढ़ावा बीस हज़ार रुपये के लगभग मूल्य का आता है। निधियों में लगाए गए धन से ग्यारह हज़ार आठ सौ रुपये का ब्याज मिलता है।
सन् 1868 में स्वामी ने पूरी जमींदारी एक प्रबंध समिति को हस्तान्तिरित कर दी थी। इसमें दो हज़ार रुपये की टिकटें लगीं थी। स्वामी के बाद श्री निवासाचार्य को नामजद किया गया था, जो अपने पूर्वज की भाँति विद्वान न होकर सामान्य जन की भाँति शिक्षित था। उसके दुराचरण के कारण व्यवस्था करने की आवश्यकता आ पड़ी। उसकी लम्पटता जगजाहिर और कुख्यात थी। उसकी फ़िज़ूलख़र्ची की कोई सीमा नहीं थी। अपने पिता के निधन के बाद वह कुछ गुज़ारा भत्ता पाता रहा। मन्दिर की व्यवस्था-सेवा के लिए मद्रास से दूसरे गुरु लाये गये। जमींदारी पूरी तरह छ: सदस्यों की एक समिति के नियंत्रण में रही। इनमें से सबसे उत्साही सेठ नारायण दास थे। सेठ को न्यासियों का मुख़्तार आम बनाया गया था। मन्दिर की बीस लाख की सम्पत्ति इसी सेठ के नाम कर दी गई। इस सुप्रबन्ध के बाद उत्सव समारोहों के आयोजनों में कोई गिरावट नहीं आने पाई और न दातव्यों की उदारता ही घटी बल्कि दफ़्तर के वैतनिक व्यय में भी कमी हुई। प्राभूत वाले गाँवों में से तीन गाँव महावन में और दो जलेसर में थे।
जयपुर नरेश मानसिंह ने रंगजी मन्दिर को ये दान किये थे। यद्यपि वह राज सिंहासन का वैधानिक उत्तराधिकारी था फिर भी वह उस पर कभी न बैठा। राजा पृथ्वीसिंह की रानी के गर्भ से वह उसके निधनोपरांत पैदा हुआ था। सन् 1779 ई॰ में पृथ्वीसिंह की मृत्यु के बाद उनके भाई प्रताप सिंह ने उत्तराधिकार का दावा किया। दौलतराव सिंधिया ने इससे भतीजे मानसिंह का अधिकार रोक दिया। मानसिंह युवा राजकुमार था और साहित्य और धर्म के प्रति समर्पित था। तीस हज़ार रुपये वार्षिक आय के आश्वासन पर राजा की उपाधि त्यागकर वह वृन्दावन वास करने लगा। उसने कठिन धार्मिक नियमों के पालन में शेष जीवनकाल यहीं व्यतीत किया। सत्तर वर्ष की आयु में सन् 1848 में उसका वहीं निधन हुआ। सत्ताईस वर्ष पर्यंत पालथी मारे एक ही मुद्रा में बैठा रहा। वह अपने आसन से नही उठता था। सप्ताह में बस एक बार ही प्राकृतिक विवशता वश आसन छोड़ता था। पाँच दिन पूर्व ही उसने अपने अन्त की भविष्यवाणी की थी और अपने बूढे सेवकों की देखभाल करने की प्रार्थना सेठ से की थी। उनमें से लक्ष्मी नारायण व्यास नामक एक सेवक सन् 1874 तक अपनी मृत्यु पर्यन्त मन्दिर की जमींदारी का प्रबन्धक बना रहा।
श्री सम्प्रदाय के संस्थापक रामानुजाचार्य के विष्णु-स्वरूप भगवान रंगनाथ या रंगजी के नाम से रंग जी का मन्दिर सेठ लखमीचन्द के भाई सेठ गोविन्ददास और राधाकृष्ण दास द्वारा निर्माण कराया गया था। उनके महान गुरु संस्कृत के उद्भट आचार्य स्वामी रंगाचार्य द्वारा दिये गये मद्रास के रंग नाथ मन्दिर की शैली के मानचित्र के आधार पर यह बना था। इसकी लागत पैंतालीस लाख रुपये आई थी। इसकी बाहरी दीवार की लम्बाई 773 फीट और चौड़ाई 440 फीट है। मन्दिर के अतिरिक्त एक सुन्दर सरोवर और एक बाग़ भी अलग से इससे संलग्न किया गया है। मन्दिर के द्वार का गोपुर काफ़ी ऊँचा है। भगवान रंगनाथ के सामने साठ फीट ऊँचा और लगभग बीस फीट भूमि के भीतर धँसा हुआ तांबे का एक ध्वज स्तम्भ बनाया गया। इस अकेले स्तम्भ की लागत दस हज़ार रुपये आई थी। मन्दिर का मुख्य द्वार 93 फीट ऊँचे मंडप से ढका हुआ है। यह मथुरा शैली का है। इससे थोड़ी दूर एक छत से ढका हुआ निर्मित भवन है, जिसमें भगवान का रथ रखा जाता है। यह लकड़ी का बना हुआ है और विशालकाय है। यह रथ वर्ष में केवल एक बार ब्रह्मोत्सव के समय चैत्र में बाहर निकाला जाता है। यह ब्रह्मोत्सव-मेला दस दिन तक लगता है। प्रतिदिन मन्दिर से भगवान रथ में जाते हैं। सड़क से चल कर रथ 690 गज़ रंगजी के बाग़ तक जाता है जहाँ स्वागत के लिए मंच बना हुआ है। इस जलूस के साथ संगीत, सुगन्ध सामग्री और मशालें रहती हैं। जिस दिन रथ प्रयोग मे लाया जाता है, उस दिन अष्टधातु की मूर्ति रथ के मध्य स्थापित की जाती है। इसके दोनों ओर चौरधारी ब्राह्मण खड़े रहते हैं। भीड़ के साथ सेठ लोग भी जब-तब रथ के रस्से को पकड कर खींचतें हैं। लगभग ढ़ाई घन्टे के अन्तराल में काफ़ी जोर लगाकर यह दूरी पार कर ली जाती है। अगामी दिन शाम की बेला में आतिशबाजी का शानदार प्रदर्शन किया जाता है। आसपास के दर्शनार्थियों की भीड़ भी इस अवसर पर एकत्र होती है। अन्य दिनों जब रथ प्रयोग में नहीं आता तो भगवान की यात्रा के लिए कई वाहन रहते हैं- कभी जड़ाऊ पालकी तो कभी पुण्य कोठी, तो कभी सिंहासन होता है। कभी कदम्ब तो कभी कल्पवृक्ष रहता है। कभी-कभी किसी उपदेवता को भी वाहन के रूप में प्रयोग किया जाता है। जैसे- सूरज, गरुड़, हनुमान या शेषनाग। कभी घोड़ा, हाथी, सिंह, राजहंस या पौराणिक शरभ जैसे चतुष्पद भी प्रयोग में लाये जाते हैं।
इस समारोह में लगभग पॉँच हज़ार रुपये की धनराशि व्यय की जाती है। वर्ष भर के रख-रखाव का व्यय सत्तावन हज़ार से कम नहीं होता। इसमें से तीस हज़ार की सबसे बड़ी मद तो भोग में ही ख़र्च होती है। भगवान के सामने रखा जाने वाला यह भोग पुजारियों द्वारा प्रयोग कर लिया जाता है या दान कर दिया जाता है। प्रतिदिन पाँच सौ श्री संम्प्रदाय अनुयायी वैष्णवों को जिमाया जाता है। प्रत्येक सवेरे दस बजे तक आटे का पात्र किसी भी प्रार्थना कर्त्ता को दे दिया जाता है। मन्दिर से 33 गाँवों की जायदाद लगी हुई है। इससे एक लाख सत्रह हज़ार रुपये की आय होती है। इसमें से शासन चौसठ हज़ार रुपये लेता है। इन तैंतीस गाँवों में से चौथाई वृन्दावन समेत तेरह गाँव मथुरा में पड़ते हैं और बीस आगरा ज़िले में। साल भर में भेंट चढ़ावा बीस हज़ार रुपये के लगभग मूल्य का आता है। निधियों में लगाए गए धन से ग्यारह हज़ार आठ सौ रुपये का ब्याज मिलता है।
सन् 1868 में स्वामी ने पूरी जमींदारी एक प्रबंध समिति को हस्तान्तिरित कर दी थी। इसमें दो हज़ार रुपये की टिकटें लगीं थी। स्वामी के बाद श्री निवासाचार्य को नामजद किया गया था, जो अपने पूर्वज की भाँति विद्वान न होकर सामान्य जन की भाँति शिक्षित था। उसके दुराचरण के कारण व्यवस्था करने की आवश्यकता आ पड़ी। उसकी लम्पटता जगजाहिर और कुख्यात थी। उसकी फ़िज़ूलख़र्ची की कोई सीमा नहीं थी। अपने पिता के निधन के बाद वह कुछ गुज़ारा भत्ता पाता रहा। मन्दिर की व्यवस्था-सेवा के लिए मद्रास से दूसरे गुरु लाये गये। जमींदारी पूरी तरह छ: सदस्यों की एक समिति के नियंत्रण में रही। इनमें से सबसे उत्साही सेठ नारायण दास थे। सेठ को न्यासियों का मुख़्तार आम बनाया गया था। मन्दिर की बीस लाख की सम्पत्ति इसी सेठ के नाम कर दी गई। इस सुप्रबन्ध के बाद उत्सव समारोहों के आयोजनों में कोई गिरावट नहीं आने पाई और न दातव्यों की उदारता ही घटी बल्कि दफ़्तर के वैतनिक व्यय में भी कमी हुई। प्राभूत वाले गाँवों में से तीन गाँव महावन में और दो जलेसर में थे।
जयपुर नरेश मानसिंह ने रंगजी मन्दिर को ये दान किये थे। यद्यपि वह राज सिंहासन का वैधानिक उत्तराधिकारी था फिर भी वह उस पर कभी न बैठा। राजा पृथ्वीसिंह की रानी के गर्भ से वह उसके निधनोपरांत पैदा हुआ था। सन् 1779 ई॰ में पृथ्वीसिंह की मृत्यु के बाद उनके भाई प्रताप सिंह ने उत्तराधिकार का दावा किया। दौलतराव सिंधिया ने इससे भतीजे मानसिंह का अधिकार रोक दिया। मानसिंह युवा राजकुमार था और साहित्य और धर्म के प्रति समर्पित था। तीस हज़ार रुपये वार्षिक आय के आश्वासन पर राजा की उपाधि त्यागकर वह वृन्दावन वास करने लगा। उसने कठिन धार्मिक नियमों के पालन में शेष जीवनकाल यहीं व्यतीत किया। सत्तर वर्ष की आयु में सन् 1848 में उसका वहीं निधन हुआ। सत्ताईस वर्ष पर्यंत पालथी मारे एक ही मुद्रा में बैठा रहा। वह अपने आसन से नही उठता था। सप्ताह में बस एक बार ही प्राकृतिक विवशता वश आसन छोड़ता था। पाँच दिन पूर्व ही उसने अपने अन्त की भविष्यवाणी की थी और अपने बूढे सेवकों की देखभाल करने की प्रार्थना सेठ से की थी। उनमें से लक्ष्मी नारायण व्यास नामक एक सेवक सन् 1874 तक अपनी मृत्यु पर्यन्त मन्दिर की जमींदारी का प्रबन्धक बना रहा।
Thursday, October 13, 2011
श्याम सुन्दर मंदिर वृन्दावन की परिक्रमा कर हम लोट रहे थे , अचानक एक रिक्शा वाला आया , 'राधे राधे 'आवाज़ आयी सुनकर हमने रास्ता दिया और वो निकल गया , वृन्दावन मैं रिक्शे वाले इसी प्रकार रास्ता मांगते हैं , और चले जाते हैं , लोंगों को अचानक राधे राधे की आवाज़ सुनकर लगता है की कोई आरहा है , मोबाईल फोन पर बात करने के लिए लोग बात चीत राधे राधे से ही शुरु करते हैं , एसा है वृन्दाबन ,
Sunday, August 21, 2011
जन्माष्टमी,भगवान श्री कृष्ण का जन्म दिवस
जय श्री राधे
कल जन्माष्टमी है , भगवान श्री कृष्ण का जन्म दिवस , सर्व प्रथम सभी पाठकों को लल्ला के जन्म दिन की बधाई ! बृज मैं इस दिन घर घर मैं कान्हा का जन्म दिन मनाया जाता है ,इस बृज के हर घर मैं कान्हा जन्म लेंगे ,मुख्य कार्यक्रम श्री कृष्णजन्म स्थान , मथुरा पर होता है ,हर मंदिर में इस दिन लल्ला के जन्म का उत्सव मनाया जाता है , अगले दिन गोकुल में नन्द बाबा के घर कृष्ण के पहुँचने का उत्सव "नंदोत्सव" मनाया जाता है , इस दिन मिठाई, खिलोने,सिक्के आदि खूब लुटाये जाते हैं ,मुंबई में गोविंदा 'मटकी फोड़ ' नंदोत्सव का
ही रूप है , इस दिन वृन्दावन में रंग जी के मंदिर में लठ्ठे का मेला होता है जो नंदोत्सव ही है
आगे फिर कभी
श्री राधे
Thursday, July 28, 2011
राधे राधे
वृन्दाबन धाम मैं सावन का महीना आनंद का है ! चारों ओर भगवान के झूलों की बहार है !हर मंदिर मैं सावन के महीने में हिंडोलों में भगवान के दर्शन का सोभाग्य मिलता है ! बाँके बिहारी जी का झूला साल में एक दिन " हरियाली तीज" पर ही होता है ! उस दिन बाँकेबिहारी जी उस दिन शाम ४ बजे से रत १२ बजे तक झोले में बिराजते हैं और भक्तों को दर्शन देते हैं
Friday, July 1, 2011
श्री निधि वन मंदिर
जय श्री राधे
आज का विषय रहेगा श्री निधि वन मंदिर ,जो मधुबन का अपभ्रंश है ! यह स्थान भगवान कृष्ण की क्रीडा भूमि है , जहाँ वे राधा रानी के साथ बांसुरी बजा कर नाचा करते थे , साथ मैं गोपियाँ भी नाचा करती थी !आज भी वृन्दाबन जो कंक्रीट का वन बनता जा रहा है , परन्तु श्री निधि वन को सुरख्यित रखा गया है , कहा जाता है यहाँ आज भी रत को भगवान श्री राधा रानी व गोपियों के साथ रासलीला करते हैं , रात मैं मंदिर मैं कोई नहीं रहता है , पुजारी भी मंदिर बंद करके परिसर से बाहर चलेजाते हैं
जय श्री राधे
Thursday, June 23, 2011
सेवा कुञ्ज ,कृष्ण द्वारा राधा रानी की चरण सेवा
जय श्री राधे
अनेक दिनों से राजनीत की ,बहस मैं उलझ गया , जिस से मूल उद्देश्य से भटक गया ! पुनः अपनी बात पर आते है !
आज का मंदिर है श्री सेवा कुञ्ज , जहाँ भगवान श्री कृष्ण ने श्री राधा रानी की चरण सेवा की थी !जब महारास के बाद श्री राधा रानी जी थक गयी तो सेवा कुञ्ज की छावं मैं बैठ गयी , परन्तु उनके थकन नहीं गयी , सब लोग अपने घरों को जाने लगे , तो भगवान ने कहा कि आप भी चलो , र्धरानी ने कहा कि मैं बहुत थक गयी हूँ , अब नहीं चल सकती ,और इतना कह कर नेत्र बंद कर लिए , तो भगवान ने श्री राधा रानी के चरण दबाना प्रारंभ कर दिया , राधा जी इतनी थक गयी कि नेत्र खोल कर देखे बिना नींद मैं चली गयी , चरण दबाने से आराम मिला तो नीद और गहरी हो गयी , कृष्ण जी चरण दबाते रहे और भोर हो गयी ! अचानक राधा रानी कि नींद खुली ,चरण दबाते देख पूछ लिया , आप क्या कर रहे हो , आप थक गयी थी न इस लिए चरण दबा रहा हूँ
आज भी सेवा कुञ्ज मैं राधा के चरण सेवा के दर्शन हैं
लोग इस लीला को सुन कर असहज हो जाते हैं , उन्हें ज्ञान नहीं है कि राधा , प्रभु की परम शक्ति हैं , न कि साधारण स्त्री , इसे समझाने के लिए मेरे पास शब्द नहीं , गुरूदेव कि कृपा से फिर कभी समझाऊंगा
जय श्री राधे
Thursday, June 9, 2011
श्री राधे
पिछले कई महीने से कुछ लिखा नहीं ,ऐसा निजी कारणों से रहा ,
पिछले हफ्ते बाबा रामदेव के अनशन पर केंद्र सरकार के कहर से दुःख पहुंचा , कि एक ऐसा आदमी जो किसी के साथ हिंसा कि बात नहीं कर रहा उस पर इस कदर डंडे का जोर दिखाना कहाँ कि बहादुरी है , ४ जून कि रात को हुए घटना क्रम को सही नहीं ठहराया जा सकता ,बाबा का तरीका गलत हो सकता है बार बात सही है ,जितना धन विदेश में काले धन के रूप में जमा है उसे वापस लाया जाये तो देश पर जितना क़र्ज़ है वो चुकाया जा सकता है ,समाजवादी पार्टी के हाल के आगरा मे हुए सम्मलेन मे सपा मुखिया ने भी इन बातों को उठाया था ,पर हाय री राजनीती ,मुलायम सिंह सरकार को समर्थन कर रहे हैं ,बाबा नेताओं को चोर , बेईमान कहते है इस लिए बाबा पर डंडे बरसाए ,निर्दोष जनता को पीटा,ओरतों,बच्चों पर भी अत्याचार किया यह गलत ,अन्याय है ,कांगरेश के महा सचिव दिग्विजय सिंह ओसामा को जी कह कर सम्भोदित करते है ,बाबा रामदेव को ठग कहते हैं , उन्हें शर्म आणि चाहिए ,में इस घटना कि निंदा करता हूँ ,आप सभी से प्राथना करता हूँ कि आप भी आपनी और से निंदा करें जिससे इन बेईमानों को लगे कि कितने लोग इन की करतूतों के विरोध में हैं
Friday, November 19, 2010
radhe
श्री राधे
राधा रानी श्याम सुन्दर जी के पवन धाम में इन दिनों कार्तिक मास कि धूम है , कार्तिक मास में कई बड़ी बृज चौरासी कोस कि यात्रा चलती रहती है जो बृज के स्वरूप कि असली पहचान करवाती है , बृज देखना हो तो इन यात्राओं के साथ एक बार जरूर जाना चाहिए , असली बृज यहाँ के गाँव में वसता है , जो यहाँ कि संस्कृती को सहेजे हुए हैं , जैसे गोकुल , महावन बलदेव , नंदगाँव , बरसाना ,गहवर वन ,गोवर्धन , भांडीर वन , राधारानी मानसरोवर , पानीगांव ( भागवत में जिसका फणीगाँव के नाम से वर्णन है , जिसके अनुसार कालिया नाग यहीं रहता था ) आदि हैं जो बृज कि यात्रा के पड़ावों में से हैं ,राधा रानी के धाम में लक्ष्मी जी का एक प्राचीन मंदिर "बेलवन "के नाम से है जो यमुना के किनारे वृन्दाबन के दूसरी ओर स्थित है ,राधादामोदर मंदिर में कार्तिक मास में सबसे धूम रहती है क्योंकि इस मंदिर में अतिप्राचीन श्री गिरिराज जी की शिला विराजमान है ,जिस की ७ (सात) परिक्रमा करने मात्र से गोवर्धन जी की एक परिक्रमा का पुण्य फल प्राप्त होता हैं
Tuesday, November 9, 2010
Monday, November 1, 2010
राधे राधे
बहुत दिनों से लिखना छह कर भी नहीं लिख पा रहा था , आज अवसर मिला है /
आज अप को वृन्दाबन के बहुत प्राचीन गोविन्द देव जी के मंदिर के बारें मैं बता रहा हूँ , यह जयपुर के राजा मानसिंह ने बनवाया था , ७ मंजिलों वाला यह मंदिर लाल पत्थर का बना था , जिस के ४ मंज़िल मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने गिरा दिए थे , ३ मंज़िलें के साथ आज भी यह वृन्दाबन का सबसे ऊंचा मंदिर है , आज कल इस की देख भाल की जिम्बेबारी पुरातत्व बिभाग की है , स्थानीय लोगों मैं यह मंदिर भूतों के मंदिर के नाम से प्रशिद्ध है क्योंकि एक किंवदंती है की प्राचीन कल मैं यह मंदिर एक रात मैं बन कर तेयार हुआ था , राजा मन सिंह ने बाद मैं केवल इस का जीर्णोद्धार करवा था
Wednesday, August 18, 2010
राधे राधे , कई दिनों से मन दुखी था सो किसानों का दर्द बांटने कि कोशिश करता रहा , मोल काम जिसका बीड़ा उठाया था कि आपको वृन्दाबन के बारे मैं जानकारी देता रहूँगा , मेंकुछ कुछ देर होरही है । मैं आप से किया वादा जरूर पूरा करूंगा , आज राधा रमण जी मंदिर के बारे मैं मैं आज जो जनता हूँ वह लिखता हूँ ,
राधा रमण जी का मंदिर गोपाल भट्ट गोस्वामी द्वारा स्थापित सालिग्राम जी का मंदिर है जो कालांतर मैं राधा रमण जी के नाम से विख्यात हुआ , श्री गोपाल भट्ट जी ने प्रथम बार सन १५४२ मैं वैसाख पूर्णिमा के दिन सालिग्राम जी का अभिषेक किया था , तभी से यह उत्सव यहाँ हर वर्ष मनाया जाता है ,जिस मैं १००० लीटर दूध से ,शहद ,घी ,दही आदि से अभिषेक किया जाता है । जन्माष्टमी पर वृन्दाबन का प्रमुख अभिषेक राधा रमण जी का ही होता है , वेसे वृन्दाबन मैं उत्सव , मेले वर्ष भर रहते हैं , राधा रमण जी का श्री विग्रह कुछ विशेष विग्रहों मैं से एक है , जिन्हें मूल विग्रह होने का गौरव प्राप्त है
श्री राधे ,
राधा रमण जी का मंदिर गोपाल भट्ट गोस्वामी द्वारा स्थापित सालिग्राम जी का मंदिर है जो कालांतर मैं राधा रमण जी के नाम से विख्यात हुआ , श्री गोपाल भट्ट जी ने प्रथम बार सन १५४२ मैं वैसाख पूर्णिमा के दिन सालिग्राम जी का अभिषेक किया था , तभी से यह उत्सव यहाँ हर वर्ष मनाया जाता है ,जिस मैं १००० लीटर दूध से ,शहद ,घी ,दही आदि से अभिषेक किया जाता है । जन्माष्टमी पर वृन्दाबन का प्रमुख अभिषेक राधा रमण जी का ही होता है , वेसे वृन्दाबन मैं उत्सव , मेले वर्ष भर रहते हैं , राधा रमण जी का श्री विग्रह कुछ विशेष विग्रहों मैं से एक है , जिन्हें मूल विग्रह होने का गौरव प्राप्त है
श्री राधे ,
Tuesday, August 17, 2010
आज़ादी कैसी जो किसानो को गोली दे ,लाठी दे
राधे राधे , आज़ादी के दिन मथुरा ,अली गढ़ ,आगरा के किसानो पर जो मायावती सर्कार का कहर टूटा है उससे धार्मिक विषय पर लिखने वाला मेरे जैसा व्यक्ति दुखी हो कर राजनीत के घ्रणित विषय पर लिख रहा है ,दिल्ली मैं बेठी गूंगी बहरी सरकार को इस मैं कोई बुराईनहीं नजर नहीं आती , हो हल्ला मचने वाले दल अपना चेहरा आईने मै देखें ,जब वो सत्ता मैं थे तब भी ऐसे हादसे हुए हैं । देश मैं अनेकों बार इस प्रकार कि घटना हो चुकी है चाहे वो सिंगूर हो ,दादरी हो या कही और , फिर भी कितने सालों से भूमि अदिग्रहण का कानून संसद मैं धुल के गुबारों मैं दबकर रह गया , उसकी यद् राजनेतिक दलों को तब आती हैं जब कोई इस प्रकार कि घटना होती है ,जिसे घटना कि भांति ही कुछ दिनों मैं भुला दिया जायेगा ,पर किसानों की किसीको चिंता नहीं है ।
Saturday, August 14, 2010
आज़ादी कि वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर
जय हिंद
एक भारतीय होने का गर्व है मुझे , हर भारतीय को होना चाहिए ,परन्तु कितने लोग गर्व करते है ।
अधिकतर लोग स्कूल ,कॉलेज , सरकारी कार्यालयों , थानों ,आदि मैं ही रास्ट्रीय झंडा फहरने का दिन मानकर कर चलते है , कही कार्यक्रम हो रहा हो तो हिलते डुलते रहते है, उन्हें लगता है की यह जिम्बेबारी केबल उन की है जो कार्यं कर या करवा रहे है , हमारे शहर वृन्दाबन मैं नगरपालिका के द्वार पर ध्वज फहराया जाता है ,वहा से गुजरने वाले लोग हँसतेहुए मजाक की तरह या तो निकलते चले जाते है या रास्ट्रीय गन होने पर भी या तो बात करते रहते या अपने काममैं व्यस्त रहते हैं । ऐसाहर शहर मैं होता है , लोगों को लगता है की स्कूल के बच्चे ,टीचर ,एन सी सी केडिट या पुलिसवालों को ही झंडे को सलामी देनी चाहिए और उन्हें ही रास्ट्रीय गानके समय सावधान होना चाहिए , इस सोच को बदलो मेरे भाइयो ,रास्ट्रीय ध्वज को सलामी ,रास्ट्रीय गान को सम्मान देना,यह हम सभी का कर्त्तव्य है , कल १५ अगस्त है , हमें अपनी आदत मैं सुधारकरना चाहिए
एक भारतीय होने का गर्व है मुझे , हर भारतीय को होना चाहिए ,परन्तु कितने लोग गर्व करते है ।
अधिकतर लोग स्कूल ,कॉलेज , सरकारी कार्यालयों , थानों ,आदि मैं ही रास्ट्रीय झंडा फहरने का दिन मानकर कर चलते है , कही कार्यक्रम हो रहा हो तो हिलते डुलते रहते है, उन्हें लगता है की यह जिम्बेबारी केबल उन की है जो कार्यं कर या करवा रहे है , हमारे शहर वृन्दाबन मैं नगरपालिका के द्वार पर ध्वज फहराया जाता है ,वहा से गुजरने वाले लोग हँसतेहुए मजाक की तरह या तो निकलते चले जाते है या रास्ट्रीय गन होने पर भी या तो बात करते रहते या अपने काममैं व्यस्त रहते हैं । ऐसाहर शहर मैं होता है , लोगों को लगता है की स्कूल के बच्चे ,टीचर ,एन सी सी केडिट या पुलिसवालों को ही झंडे को सलामी देनी चाहिए और उन्हें ही रास्ट्रीय गानके समय सावधान होना चाहिए , इस सोच को बदलो मेरे भाइयो ,रास्ट्रीय ध्वज को सलामी ,रास्ट्रीय गान को सम्मान देना,यह हम सभी का कर्त्तव्य है , कल १५ अगस्त है , हमें अपनी आदत मैं सुधारकरना चाहिए
Thursday, August 12, 2010
हरियाली तीज
राधे राधे
आज हरियाली तीज है , आज से वृन्दाबन मैं ठाकुरजी को झूलों मैं झुलाया जाता है , तीज से रक्षाबंधन तक वृन्दाबन मैं आज के दिन बाँकेबिहारी जी को सोने के रत्नों से जडित हिंडोले मैं झुलाया जाता है , यह झूला साल मैं केवल हरियाली तीज के दिन ही निकला जाता हैं, लाखों लोग इस अवसर पर वृन्दाबन मैं आते हैं ,इस साल प्रशासन ने १० लाख लोगो के आने का अनुमान लगाया है ,
आज हरियाली तीज है , आज से वृन्दाबन मैं ठाकुरजी को झूलों मैं झुलाया जाता है , तीज से रक्षाबंधन तक वृन्दाबन मैं आज के दिन बाँकेबिहारी जी को सोने के रत्नों से जडित हिंडोले मैं झुलाया जाता है , यह झूला साल मैं केवल हरियाली तीज के दिन ही निकला जाता हैं, लाखों लोग इस अवसर पर वृन्दाबन मैं आते हैं ,इस साल प्रशासन ने १० लाख लोगो के आने का अनुमान लगाया है ,
Saturday, July 17, 2010
राधा वल्लभ जी का मंदिर
राधे राधे
बहुत दिनों बाद आप से बात हो रही है , आज श्री राधा वल्लभ जी मंदिर के बारे मैं बात करेंगे , राधा वल्लभ मंदिर, बाँके बिहारी जी मंदिर के पास है , श्री हित हरिवंश संप्रदाय का यह मंदिर बहुत ही प्रसिद्ध है
आगे बाद मैं लिखूंगा
बहुत दिनों बाद आप से बात हो रही है , आज श्री राधा वल्लभ जी मंदिर के बारे मैं बात करेंगे , राधा वल्लभ मंदिर, बाँके बिहारी जी मंदिर के पास है , श्री हित हरिवंश संप्रदाय का यह मंदिर बहुत ही प्रसिद्ध है
आगे बाद मैं लिखूंगा
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